साहित्य-संस्कृति

विभाजन को समझे बिना हल नहीं होगा सौहार्द का प्रश्न

सामाजिक सौहार्द का मतलब केवल शांतिपूर्ण सहअस्तित्व नहीं होता. शांति तो ताकत और दमन से भी कायम की जा सकती है. शांति तो युद्धविराम की भी हो सकती है. शांति तो मजबूरी की भी हो सकती है. पर ऐसी शांतियों के भीतर भीषण अशांतियाँ खौलती रहती हैं. कभी भी फुट पड़ने को आतुर. सौहार्द्र का मतलब है एक दूसरे की जरूरत महसूस करना। अपने अधूरेपन को समझना और महसूस करना कि दूसरे के बिना वो पूरा नहीं हो सकता.

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नई दिल्ली. 17 नवम्बर को दिल्ली में जसम आयोजित कुबेर दत्त व्याख्यान में प्रोफ़ेसर राजीव भार्गव ने ढेरों विचारोत्तेजक बातें कहीं। इससे उपरांत चर्चा चमकदार हो गई।

सामाजिक सौहार्द का मतलब केवल शांतिपूर्ण सहअस्तित्व नहीं होता। शांति तो ताकत और दमन से भी कायम की जा सकती है। शांति तो युद्धविराम की भी हो सकती है। शांति तो मजबूरी की भी हो सकती है। पर ऐसी शांतियों के भीतर भीषण अशांतियाँ खौलती रहती हैं। कभी भी फुट पड़ने को आतुर।

सौहार्द्र का मतलब है एक दूसरे की जरूरत महसूस करना। अपने अधूरेपन को समझना और महसूस करना कि दूसरे के बिना वो पूरा नहीं हो सकता।

भारत में किसी समय विभिन्न समुदायों के बीच ऐसी समझ और मिलजुल कर बढ़ने की सिफ़त होती थी। होती थी। उन्नीसवीं सदी में,जब सभी धर्म-समुदाय अपनी किलेबंदी में जुट गए, अन्य को शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी । विभाजन इस प्रक्रिया का चरमबिन्दु था।

विभाजन का सामना करने ,समझने और उसका पश्चाताप करने से बचने की कोशिश, प्रोफेसर भार्गव ने कहा, अपने भीतर बैठे शैतान का सामना करने से बचने की कोशिश है।

यही गांधीजी अपने आखिरी दिनों में कहा करते थे-अपने भीतर बैठे शैतान को समझो। जब तक एक राष्ट्र के रूप में हम ऐसा नहीं करेंगे, भारत में सामाजिक सौहार्द कायम नहीं कर पाएंगे।

बजरंग बिहारी तिवारी ने यह कह कर हस्तक्षेप किया कि न्याय के सवाल को हल किए बिना सौहार्द्र के सवाल को हल नहीं किया जा सकता। इस पर प्रोफ़ेसर ने आगे जोड़ा कि न्याय का संघर्ष जरूरी है, लेकिन उतना ही सौहार्द के लिए पर्याप्त नहीं है। यह एक अलग मुकम्मल एजंडा है।

रपट लेखक की बात यह थी कि सब कुछ के बावजूद सौहार्द्र गरीब मेहनतकश अवाम के लिए कभी इतना जटिल मसला नहीं होता, जितना मध्यवर्ग के लिए। दूसरे भारत में वर्ग और जाति की विषमताएं अनेक बार साम्प्रदायिक कलह के रूप में ख़ुद को अभिव्यक्त करती हैं।

शासक भी चाहता है कि ऐसा ही हो। साम्प्रदायिक कलह जितनी तेज होगी, बुनियादी आर्थिक सामाजिक सवालों पर पर्दा डालना उतना ही आसान होगा।

देश का विभाजन भी ऐसे ही नेताओं के बीच बंदरबांट के रूप में घटित हुआ। अवाम को हस्तक्षेप करने का मौका ही नहीं दिया गया।

प्रोफ़ेसर ने इन नुक़तों से सहमति जताई। कुल मिलाकर बहुत दिनों बाद दिल्ली की यह एक सघन वैचारिक सांझ थी।

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