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December 7, 2019
जेरे बहस

साम्प्रदायिकता का प्रश्न और दलित स्त्री कविता

राजनीति से दलित साहित्य की दूरी कभी नहीं रही| धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में वर्णवादी जकड़न से जूझते हुए दलित साहित्य ने राजनीति के बारे में अपनी समझ बनाई|

वर्णवादियों से दुरभिसंधि किए बैठी राजनीति से उसकी लड़ाई स्वाभाविक ही थी| यह स्वीकारने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि दलित साहित्य विमर्श ने अपनी लड़ाई को मुख्यतः जाति-वर्ण तक सीमित रखा| इस संकेन्द्रण की जड़ें भारतीय समाज की बनावट से निकली थीं|

इस सीमा को लांघने की कसमसाहट कालांतर में प्रबल होती गई| दलित स्त्रियों के आगमन ने जब अस्मिता-विमर्श के सरोकारों का विस्तार किया तब जातिजनित दुखों से भिन्न दुख भी नज़र आने लगे| वर्णवादी चारदीवारी में छेद होते गए| अब दलित लेखन की चिंताओं में साम्प्रदायिकता का प्रश्न महत्त्व पाने लगा|

धर्माधारित टकराव और हिंसा तो अन्य समाजों की तरह हमारे समाज में भी सुदूर अतीत से चली आ रही थी लेकिन उससे उपजी साम्प्रदायिकता औपनिवेशिक युग की देन है| एक धार्मिक समूह द्वारा दूसरे धार्मिक समूह को असह्य शत्रु मानकर उसे दबाकर रखने, देश निकाला देने या समूलोच्छेद करने के उद्देश्य से की जाने वाली हिंसा साम्प्रदायिकता कही जाती है| यह हिंसा स्थूल हो सकती है और सूक्ष्म भी|

यह लंबे समय तक बनी रह सकती है, दीर्घावधि के लिए सुषुप्तावस्था में जा सकती है अथवा कुछ समय के लिए गायब भी हो सकती है| किसी क्षेत्र का बहुसंख्यक समूह प्रायः अल्पसंख्यकों को अपना शिकार बनाता है| साम्प्रदायिक हमलों के पीछे धार्मिक भिन्नता आवरण का काम करती है, बहाना भर होती है|

धर्मेतर कारण ही प्रमुख होते हैं| अल्पसंख्यक समुदाय के आर्थिक आधार को छिन्न-भिन्न करना अक्सर साम्प्रदायिक दंगों का लक्ष्य हुआ करता है| दंगे की विभीषिका सबसे ज्यादा स्त्रियाँ, बुजुर्ग और बच्चे झेलते हैं| यहाँ ‘दंगा’ शब्द पर कुछ कहना जरूरी लग रहा है| दंगा कहने से ध्वनि यह निकलती है कि इसमें दोनों या सभी पक्षों की बराबर की भागीदारी है जबकि वस्तुस्थिति यह कि साम्प्रदायिक हमला एकपक्षीय हुआ करता है| हमले से बचने के लिए, जान-माल की रक्षा के लिए पीड़ित समुदाय जो उपाय करेगा उसे उसकी भागीदारी नहीं कहा जा सकता|

दलित स्त्री रचनाकार इस पीड़ा को समझती हैं| वे यह भी जानती हैं कि जो ताकतें अल्पसंख्यकों को निशाना बनाती हैं वही जातिवादी हिंसा में भी शामिल रहती हैं| उनके दुःख में शामिल होना, उनके साथ खड़ा होना इसलिए उन्हें आवश्यक लगता है| प्रियंका सोनकर की कविता की पंक्तियाँ हैं-
आज मेरे सामने है
फिर
दादरी, फरीदाबाद…
तुम्हारे हाथों में है
और भी लंबी सूची
न जाने कब

तुम शीघ्र ही
फिर भरोगे दंभ अपनी जाति का,
जलेंगे
और कितने शहर… गाँव… बस्तियाँ… मकान
जिससे बेखबर हूँ मैं|
(‘कथादेश’ पृ.40)

दादरी कांड 2015 में हुआ था| फासीवादी साम्प्रदायिक भीड़ ने 28 सितंबर को घर में गौमांस होने के आरोप के बहाने एक मुस्लिम परिवार पर हमला किया और गृहस्वामी मो. अख़लाक़ को मार डाला तथा उसके बेटे दानिश को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया था| फरीदाबाद कांड 20 अक्टूबर 2015 में हुआ था| सुनपेड़ गाँव का एक दलित परिवार आगजनी का शिकार हुआ था| इसमें उसके दो बच्चे जलकर मर गए थे और पति-पत्नी झुलस गए थे|

हिंदी में दलित स्त्रीवादी आलोचना की पहली व्यवस्थित किताब सन् 2008 में छपी| विमल थोरात की ‘दलित साहित्य का स्त्रीवादी स्वर’ (अनामिका पब्लिशर्स, नई दिल्ली)| इस किताब के दो लेख साम्प्रदायिकता पर केन्द्रित हैं| ‘धर्म और सत्ता की अराजकता’ लेख में उनकी चिंता है- “हिंसा का एक नया प्रयोग पिछले दस वर्षों से निरंतर किया जाना यही दर्शाता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जन्मी इस आतंकवादी प्रवृत्ति ने कैसे-कैसे रूप धर लिए हैं| … हमारी स्मृतियों से 2002 के गुजरात के सामूहिक हत्याकांड की खौफनाक यादें हटी नहीं हैं| बार-बार हत्या, बलात्कार और जिंदा लाशों में तब्दील इंसानों की चीखें, दर्दनाक मंजर मानवता को नश्तर चुभोती रहती हैं|

सांस्कृतिक राष्ट्र की कल्पना कितनी भयावह हो सकती है, उसका हिंसक चरित्र कैसे-कैसे कहर बरपा सकता है, इसका अनुभव देश के भविष्य को भी चिंतित करता है|” साम्प्रदायिकता के राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझना कठिन नहीं है| समाज में अगर अमन-चैन कायम होता है, धार्मिक सद्भाव का वातावरण बनता है, क़ानून को अपना काम करने दिया जाता है तो उसका लाभ वंचित तबके को मिलता है| वे पेट भरने की चिंता के वृहत्तर पहलुओं को समझने की दिशा में अग्रसर होते हैं| वे अपने आर्थिक हितों को बेहतर ढंग से पहचानने लगते हैं| उन हितों पर डाका डालने वालों की पोल पट्टी भी उनके सामने खुलने लगती है|

आर्थिक आधार पर वंचित समुदायों में वर्गीय एकता भी पनपने लगती है| यह सब वर्चस्वशालियों को संकटापन्न करता है| धार्मिक उन्माद और साम्प्रदायिक दंगे उन्हें खतरे से उबारने का काम करते हैं| धर्मनिरपेक्षता से उन्हें इसीलिए चिढ़ है| धर्मनिरपेक्ष संविधान के आर्थिक आयाम को वे बखूबी समझते हैं| उनकी पूरी कोशिश रहती है कि धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा विवादित रहे, संदिग्ध रहे| विमल थोरात ने उक्त पुस्तक में शामिल अपने दूसरे निबंध ‘हिंदी प्रदेश में स्त्री, दलित और अल्पसंख्यक’ में लिखा है- “जब-जब एकता के सूत्र में बंधकर आपसी भाईचारे का सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने की कोशिश होने लगती है तब ही धर्म को अस्त्र बनाकर उसके ठेकेदार देश में आतंक, दमन, हिंसा और धार्मिक उन्माद के फैलाव से धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को तहस-नहस कर देते हैं|”

दलित स्त्री कविता में साम्प्रदायिक उन्माद के स्रोतों को पहचानने, उसके परिणामों को समझने और उसे रोकने के उपायों को तलाशने की कोशिश दिखाई पड़ती है| सुशीला टाकभौरे ‘नया इतिहास’ कविता में धर्म की परिभाषा बदलने, राजनीति को धर्मनीति से अलग करने की मांग करती हैं| बच्चों को साम्प्रदायिक, युद्धोन्मादी बनाए जाने के विरुद्ध आवाज उठाती हुई रजनी तिलक लिखती हैं-
“मैं अपने बच्चों को
इंसान बनाना चाहती हूँ,
उस देश में भी मेरी-सी माएं
अपने बच्चों पर अरमान सजाती होंगी
वो भी उन्हें कुछ बनाने की
ललक लिए दुलारती होंगी|”
(‘पदचाप’, पृ. 7)

वर्ष 2002 में गोधरा काण्ड के बाद गुजरात भीषण फासीवादी साम्प्रदायिक हमले का साक्षी बना| शासन-प्रशासन कुछ कर न पाया और साम्प्रदायिक भीड़ हत्याएं करती, मुस्लिम बस्तियाँ उजाड़ती रही, आग के हवाले करती रही| मुस्लिम स्त्रियों का सामूहिक बलात्कार होता रहा, गर्भवती स्त्रियों के पेट चीरकर भ्रूण शिशुओं को काटा जाता रहा|

दलित राजनीति ने इस जनसंहार पर घोर असंवेदनशीलता दिखाई लेकिन दलित स्त्री रचनाकारों ने अपना ‘स्टैंड’ लिया| विमल थोरात का मंतव्य ऊपर दिया ही जा चुका है| साम्प्रदायिकता को केन्द्र में रखकर लिखे गए शिवमूर्ति के ‘त्रिशूल’ उपन्यास पर विचार करते हुए रजनी दिसोदिया ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ वाले ‘सैद्धांतिक’ कथन के हवाले से इस ‘घिनौने हिंसक’ काण्ड की मीमांसा की है|

वे साम्प्रदायिकता के सभी पक्षों को समेटकर विश्लेषण करना जरूरी समझती हैं| उनका कहना है कि साम्प्रदायिकता समाज के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया से सम्बद्ध है| यह देव-दानव, बौद्ध-ब्राह्मण, आर्य-अनार्य जातियों के संघर्ष की परंपरा का स्मरण कराती उसी सिलसिले की नई कड़ी है| “यह सब इतना सरल और एकपक्षीय नहीं है जितना प्रायः समझ लिया जाता है| यह संघर्ष और टकराव चाहे सम्प्रदायों को लेकर हो या जाति को लेकर अपने आप में नए लोकतंत्रीकरण समीकरणों में होने वाला शाश्वत सत्ता संघर्ष है|” (‘साहित्य और समाज : कुछ बदलते सवाल’, पृ. 119) ‘फिर चीत्कारो’ कविता में रजनी तिलक ने लिखा-
“आज उसी गुजरात में
फिर क़त्ल हुई अहिंसा
प्रतिक्रिया की एकतरफा जंग में
मुस्लिम मजलूम हुए स्वाहा
कौन है गुजराती मुस्लिम
कहाँ से आए?”
(‘पदचाप’, पृ.54)

रजनी अपनी इस कविता के अंत में बताती हैं कि ये पीड़ित यहीं के ‘मूल निवासी सर्वहारा’ थे जो धर्मांतरित हुए हैं| साम्प्रदायिकता के सवाल को हिंदू-मुस्लिम के दायरे तक सीमित न करके वे 1984 में हुए सिख विरोधी दंगे को भी अपनी कविता का विषय बनाती हैं| इस दंगे और सिखों के कत्लेआम पर दलित कविता में रजनी की यह रचना- ‘1984 की लपटें’ अपवाद की तरह है| सामान्य हिंदी कविता में भी इस पर बहुत कम लिखा गया है-
“उस दिन
क्या गुजरी दिल्ली में, कैसे सुनाऊँ
रात अभी कुछ शुरू होने को थी
‘आई’ की लाश अभी ताज़ा थी
दीये भी जलने को आतुर थे
अंगीठी चूल्हे गर्माने को थे
एक बवंडर आया जोरों से
… … …
और धूं-धूं करता धुआं उठा
लपटों और धुएं में
करुण दारुण चीत्कारें उठीं
बिलखते बच्चे, जीवन-दान मांगतीं औरतें
फूट-फूटकर रोते सिख भाई
यह कैसी थी आई आँधी
जिसने उखाड़ दिया मन-मानस को|”
(‘हवा सी बेचैन युवतियां’, पृ. 70-71)

सांस्कृतिक अंतर्धाराओं की आवाजाही और राष्ट्रीय एकता के नारों के बीच लोग अपने ही घर में कैसे बेगाने हो जाते हैं, अपने ही मुल्क में कैसे बेगाने बना दिए जाते हैं, गुंडों-दंगाइयों के सामने किस तरह बेबस हो जाते हैं- उक्त कविता के अंत में रजनी तिलक यह प्रश्न पूछकर हमें अपनी बेचैनी में शरीक कर लेती हैं|

अपनी एक कविता में कुंती स्पष्ट करती हैं कि जिसे उनकी कविता कहा जा रहा है वह तो भ्रूणों का आर्तनाद है, बलात्कृता का जख्म है, “यह करुणा विलाप है उस हृदय का/ अकारण हादसे में मारा गया है लाल जिसका” (‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’, पृ. 33)| हेमलता महिश्वर राष्ट्रीय एकता के नारे को एक बिडम्बना के रूप में देखती हैं|

‘बिडम्बना’ शीर्षक कविता में वे साम्प्रदायिक दंगे में ध्वस्त मकानों की निर्माण सामग्री ईंट-गारा-चूना-मोरंग की भिन्नता चीन्हना चाहती हैं| वे पाती हैं कि न केवल सभी मकानों की सामग्री एक-सी है वरन पनीली आँखों में तिरती वे हसरतें, भावनाएं और मंसूबे भी भिन्न नहीं हैं| सभी घरों के एक-से हैं चूहे-बिल्ली-कुत्ते, कुआँ-नीम-आम, पुरवाई-छाँव-घाम, गौरैया-उल्लू-कोयल, लुटिया-चारपाई-नींद, बंडी-धोती-चूड़ी, कलह-समझौता-प्रेम! अंतर कहाँ है? प्राणी, वनस्पति, वस्तु और भाव जब एक-से हैं तब इस दहशत-हिंसा-तबाही के स्रोत कहाँ तलाशे जाएँ?
साँय साँय
बंदूकों की संगीनें
कदमताल
या फिर ठाँय ठाँय
मलबा रह गई ऐसे ही
वह दूसरी तीसरी चौथी इमारत
मिट्टी में मिलती प्यार की इबारत

नहीं, कोई नहीं थी पहचान
मंदिर या मस्जिद
मलबे को भी पता नहीं था
ईंट गारा
कुछ भी तो जुदा नहीं था
पसीना तो खारा था हाय
आँसू भी खारे ही तो हैं|
(‘नील, नीले रंग के’, पृ. 90)

अपने पहले संग्रह ‘माँ मुझे मत दो’ (2010) में पूनम तुषामड़ धार्मिक-साम्प्रदायिक पहचान के समक्ष वर्गीय और जातीय पहचान ले आती हैं और जानना चाहती हैं कि एका स्थापित करने में बाधा कहाँ है| एक विश्वविद्यालय जामिया में दो कर्मचारी हैं| दोनों सफाईकर्मी| एक ही जाति के हैं| उत्पीड़ित होने का एक जैसा अनुभव है| वे एक (आर्थिक) वर्ग के हैं| फिर भी, वे खुल कर मिल नहीं पाते| पहला कर्मचारी दूसरे से इस मुद्दे पर संवाद करता है-
एक कहता है-
मैं हिंदू हूँ या मुसलमान
क्या फर्क पड़ता है?
गरीब मैं भी हूँ
तुम भी
मैं भी बंटवारे का शिकार हुआ
तुम भी
मैं भी अपने घर से जुदा हुआ
तुम भी

मैंने भी अपनों को खोया
तुमने भी
मैं भी यहाँ सफाईकर्मी हूँ
तुम भी
फिर हम दोनों में क्या अलग है?

दूसरा गहरी ठण्डी साँस भरता है
‘यह धर्म है’ जो हमें
फिर भी अलग करता है|’
(‘माँ मुझे मत दो’, पृ. 36)

वर्ष 2019 में प्रकाशित पूनम तुषामड़ के दूसरे कविता संग्रह ‘मदारी’ पर साम्प्रदायिकता की गहरी छाया है| इस संग्रह की कम से कम चार कविताओं में पूनम ने साम्प्रदायिक हिंसा का मुद्दा उठाया है| एक कविता में वे ‘मॉब लिंचिंग’ का मुद्दा उठाती हैं|

वर्तमान सरकार के पिछले दौर (2014-2019) में साम्प्रदायिक हिंसा ने अपना रूप बदल लिया है| लूटने-जलाने-हत्या करने वाले लोग वही हैं लेकिन अब उन्हें साम्प्रदायिक नहीं कहा जाता| उनकी यह पहचान गायब हो गई है| अब उन्हें ‘मॉब’ (भीड़) कहा जाता है| उनके द्वारा की गई ‘लिंचिंग’ (हत्या) पूर्वपरिचित खौफ नहीं उपजाती| सब ज्ञात हुए भी सब अमूर्त रहता है| प्रशासन और न्याय व्यवस्था की ‘सिरदर्दी’ भी कम हो जाती है|

‘जागो…! अब खामोश रहो मत’ नामक कविता में पूनम तुषामड़ ‘मॉब लिंचिंग’ के शिकार हुए अखलाक और जुनैद का नामोल्लेख कर इस प्रकरण को ठोस संदर्भ देती हैं| ‘मेरे समय की कविता’ में वे तमाम साम्प्रदायिक दंगों का हवाला देते हुए बलात्कृत बच्चियों/ महिलाओं की यातना को शब्द देती हैं| ‘देश’ कविता में वे लव जिहाद, भारतमाता, गाय माता, देश प्रेम और जय श्रीराम के अंतस्संबंध का संकेत करती हैं जिसका मकसद होता है ‘भूख, गरीबी और लूट’| बिलकिस बानो पर लिखी कविता में पूनम दंगाइयों की अंतरात्मा से प्रश्न करती हैं| अहमदाबाद के पास रणधीकपुर गांव में उग्र साम्प्रदायिक भीड़ ने 3 मार्च 2002 को बिलकिस बानो के परिवार पर हमला बोला था|

इस हमले के समय बिलकिस बानो पांच महीने की गर्भवती थी| उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था| साथ ही उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या कर दी गई| अभी 23 अप्रैल 2019 को भारत के उच्चतम न्यायालय ने बिलकिस बानो के पक्ष में फैसला सुनाया है| लेकिन, इस न्याय तक पहुँचने के लिए बिलकिस ने सत्रह वर्षों तक संघर्ष किया! इस उत्पीड़ित और न्याय के लिए संघर्षशील बिलकिस बानो से कवि अपना तादात्म्य स्थापित करती है|

बिलकिस का दुःख उसका हो जाता है| बिलकिस की यातना उसकी हो जाती है| बिलकिस की गुहार कवि की गुहार हो जाती है| ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते उन आततायियों और उनके समर्थन में खड़े राजनेताओं से कवि प्रश्न करती है? वह पूछती है कि तुम्हारी माँ, बहन और बेटियों से मैं किस अर्थ में अलग हूँ? तुम्हारी भारत माँ की देह से मेरी देह भिन्न कहाँ है? मैं भी तो उसी का अंश हूँ-
जरा देखो मुझे गौर से
मैं भी उसी का अंश हूँ
फिर क्यों नहीं
काँप उठते तुम्हारे हाथ
मेरी छाती मेरे वक्ष या
मेरी जंघाओं तक पहुँचते हुए|
(‘मदारी’, पृ. 54)

इस कविता का अंत बड़ा मार्मिक, प्रश्नाकुल और स्तब्धकारी है| बिलकिस भारत माता से मुख्तलिफ नहीं| कवि बिलकिस जैसी| न्याय के लिए तमाम बिलकिस जूझ रही हैं| उनका जूझना अपनों से भिड़ना है| असमाप्य संघर्ष ही उनकी नियति बन गई लगती है-
माना कि मैं
बिलकिस बानो नहीं हूँ
पर बिलकिस बानो का ही अक्स हूँ|
हजारों हजार बिलकिस
इंतजार में हैं
क्षण-क्षण बीत रहा है
वे लड़ रही हैं लगातार
आखिर दोनों तरफ
उन्हीं के भाई हैं
बेटे हैं पति हैं
वे जोह रही हैं बाट
कब मिलेगा उन्हें भी न्याय!
(‘मदारी’ पृ. 56-57)

नवोदित कवि रानी कुमारी साम्प्रदायिकता को गंदे नाले की तरह देखती हैं| ऐसा नाला जिसमे युवाओं के अरमान, बेहतरी के अवसर दफ़न किए जाएंगे| साम्प्रदायिकता बुनियादी सवालों से ध्यान भटकाने के लिए उभारी जाती है| इससे वर्चस्वशालियों की सुरक्षा होती है और आम जनों की तबाही|

‘सपने’ शीर्षक कविता में वे कहती हैं कि साम्प्रदायिकता का नाला मंदिर और मस्जिद के बीच से गुजरता है| यह युवा वर्ग के सपनों को डुबोने की ताकत रखता है-
इन छोटे-छोटे सीलन भरे कमरों में
युवाओं के बड़े-बड़े सपने पलते
गिरते-पड़ते संभलते
अपने सपनों को
मन और आँखों में संजोए हैं
पता नहीं…
ये सपने पूरे होंगे
या फिर
मंदिर और मस्जिद के बीच
गंदे नाले में बह जाएंगे!

मानव मुक्ति का कोई प्रयास जब हिंसा के सवालों से जूझते हुए आत्म विस्तार करता है तब उसकी चिंताधारा में नए प्रश्न जुड़ने लगते हैं| अस्मिता की जो लड़ाई ‘स्व’ से परिसीमित थी उसे दलित स्त्रियों ने वृहत्तर बना दिया| जो भी उत्पीड़ित है वह हमसे भिन्न नहीं है| उसकी लड़ाई हमारी है|

न्याय के लिए उसके संघर्ष में हम भी भागीदार हैं| दमित अस्मिताओं में एका होनी चाहिए| दलित स्त्री की मुक्ति-चेतना ने अस्मितावाद में इस तरह के भाव उत्पन्न किए| उसने यह भी समझा कि साम्प्रदायिक हिंसा के पैरोकारों का दृश्य चेहरा बड़ा उदार, बड़ा मोहक होता है| उसका सम्मोहन बहुत जल्दी ग्रस लेता है और आसानी से छोड़ता नहीं| रजनी अनुरागी की शिनाख्त है-
घृणास्पद चेहरों पर फैला है
उदारता का आवरण
मैला अंतर्मन वही
आवरण नए
फैलती विषबाहु नई
इसमें उदरस्थ मानव
कब नया होगा?

साम्प्रदायिक राजनीति ने ‘लव जिहाद’ का मुद्दा खड़ा किया| कौम की चिंता में दुबले होते सम्प्रदायवादी मोहब्बत के दुश्मन बनकर कहर बरपाने लगे| दावा किया गया कि मुस्लिम युवक हिंदू युवतियों को अपने प्रेमजाल में फंसाकर, बरगलाकर धर्म परिवर्तन का अभियान ‘लव जिहाद’ छेड़े हुए हैं|

यह शिगूफा चल निकला| व्यक्ति-गरिमा, व्यक्ति-स्वातंत्र्य, संवैधानिक अधिकारों और मानवीय मूल्यों को धता बताते हुए ऐसे जोड़ों पर हमले होने लगे जिन्होंने अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुना था| साम्प्रदायिक द्वेष को भड़काने में ‘लव जिहाद’ का भरपूर इस्तेमाल किया गया| कौम के स्वयंभू रक्षकों ने इस तरह कई मोहब्बतों को कुचला, कई जोड़ों को अलग किया| अंतरधार्मिक और अंतरजातीय प्रेम संबंधों तथा विवाह संबंधों को कुचले जाने पर अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए चंद्रकांता ने ‘सिलसिले’ कविता में लिखा-
लेकिन करवटें बदलता ये मौसम
कभी तो लिखेगा
उन सबका भी गुनाह
जिन्होंने जब-तब-अक्सर
मजहब, जात और बिरादरी के
गुणा-भाग-गणित में उलझाकर
मेरी मासूम हसरतों को
रौंदा, कुचला, मार डाला, और
गाड़ दिया रस्म-ओ-रिवाज के ताबूत में|
(‘एक स्त्री का स्वप्न’, पृ. 34)

जैसे युद्ध पहले दिमागों में लड़े जाते हैं बाद में युद्धभूमि में, वैसे विभाजन पहले सोच के स्तर पर घटित होता है फिर असल जिंदगी में नजर आता है| जनता के साझेपन को, मुश्तर्का तहजीब को इसी तरह घटाया, तोड़ा या मिटाया जाता है| इस उपमहाद्वीप के पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे मजहबी मुल्कों में यह प्रक्रिया पहले घटित हुई|

साझेपन के तंतुओं को पहले मानसिक स्तर पर नष्ट किया गया| इसके बाद वास्तविक जीवन से उनका उच्छेद आसान हो गया| जैसे इस मुल्क में टोलों, मुहल्लों, बस्तियों की ‘पहचान’ कर ली जाती है और ‘मिनी पाकिस्तान’ की रचना हो जाती है वैसे वहाँ हिंदुस्तान बनते हैं| बनाकर मिटाए जाते हैं| यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है|

चंद्रकांता ने इस सिलसिले को समझा और अनवरत ‘वि-भा-ज-न’ को, उसके नतीजों को ‘कितने बिंदु’ कविता में इस तरह शब्द दिए-
यह वही देश है
जहाँ तु-त-ला-ती बोली में
हमारे छोटे नागरिकों ने
पहली बार अम्मा-बाबा बोला था
अब वे ‘सहमे हुए’ परिंदे बन गए हैं

देश के किसी मोहल्ले में
कच्ची-पक्की बिल्डिंगों के बीच
छिपन-छिपाई खेलते हुए
परिंदों के इन इंद्रधनुषी गुच्छों का रंग
अब हरा और केसरी हो गया है
… … …
अतीत की मासूम नटखट टोलियाँ
अब ‘वोट बैंक’ में बदल गई हैं
कंचे की गोलियों का रिक्त हुआ स्थान
अब बंदूक की नाल ने ले लिया है
बच्चे बारूद बन गए हैं
और हमारी औरतें ‘मानव बम’ में तब्दील हो गई हैं
(‘एक स्त्री का स्वप्न’, पृ. 28)

व्यावहारिक राजनीति में जिस ‘दलित-मुस्लिम एकता’ की संभावनाएं तलाशी जाती हैं, इस गठजोड़ को कार्यरूप देने की कोशिशें चलती रहती हैं दलित स्त्री कवियों की राह उससे भिन्न है| वे सत्ता पर काबिज होने की किसी फौरी जरूरत के तहत सक्रिय नहीं हैं| इस तरह का गठबंधन राजनीतिक परिदृश्य को बदलने में बेशक अपनी भूमिका निभा सकता है लेकिन वह मानसिक बाड़ेबंदी को तोड़ने में दिलचस्पी नहीं रखता|

उलटे, ऐसी बाड़ेबंदी का कायम रहना उसकी वोट की राजनीति में फायदा ही पहुँचाता है| और, जब सत्ता प्राप्ति ही मंजिल हो तो अनुकूल अवसर देखकर दलित राजनीति साम्प्रदायिक ताकतों के साथ हाथ मिला लेती है तथा मुस्लिम राजनीति कट्टर मजहबी मूल्यों की पैरोकार बन जाती है|

इन दोनों के विपरीत दलित स्त्री काव्य-दृष्टि एक ऐसे समाज को संभव करना चाहती है जो धर्माधारित न होकर मानवता आधारित हो| जहाँ अलगाने वाली रेखाएं पीछे पड़ जाएं, धुंधली हो जाएं और समानता बढ़ती जाए| सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो और मानवाधिकार अक्षुण्ण रहें|

साम्प्रदायिक विभीषिका को शिद्दत से समझने वाली और अपनी कविताओं में उसे अपेक्षाकृत विस्तार से चित्रित करने वाली रचनाकार हैं अनिता भारती| उनका दूसरा काव्य-संग्रह ‘रुखसाना का घर’ (2015) साम्प्रदायिक ताकतों के विध्वंसकारी कारनामों को सामने लाता है|

उन्मादी वक्त को बड़ी संवेदनशीलता से शब्द देती हुई अनिता भारती ‘सहिष्णु’ समाज की नैतिकता को प्रश्नबिद्ध करती हैं| उक्त काव्य-संग्रह मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक दंगे से संदर्भित है| इस दंगे के बाद शरणार्थी शिविर में रह रहे मुस्लिम परिवारों को देखकर-मिलकर अनिता भारती ने अपनी प्रतिक्रिया को ‘मुजफ्फरनगर से लौटने के बाद’ शीर्षक से लिखी 12 कविताओं में व्यक्त किया|

यह साम्प्रदायिक हिंसा जिले के कवाल गाँव से शुरू हुई और जल्दी ही आसपास के जिलों शामली, बागपत और सहारनपुर में फैल गई| 27 अगस्त 2013 को जाट समुदाय की एक लड़की से मुस्लिम युवक द्वारा छेड़छाड़ के आरोप पर आरंभ हुई यह हिंसा इन इलाकों में 17 सितंबर ‘13 तक जारी रही| विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े दंगाइयों की इस हिंसा में भूमिका देखी गई| तमाम घर उजड़ गए और शताधिक लोग हताहत हुए| अभी तक यह इलाका सामान्य नहीं हुआ है|

स्वर्णिम इतिहास का ढिंढोरा पीटकर गौरवान्वित होने वालों से अनिता भारती कहती हैं- “कितना भी मुँह छिपाओ/ सफ़ेद चादर में/ पर खून के दाग/ छिपाए न छिपेंगे/ कितना भी स्वर्णिम इतिहास बताओ/ अँधेरे कोने-किनारे/ सच उगल देंगे/ जितना दिखाओ/ ठेंगा झूठ का/ सच तुम्हें खोज ही लेगा|” इस दंगे की शिकार रुखसाना से समानुभूति स्थापित करती हुई कवि लिखती है-
रुखसाना!
तेज आवाज के साथ
रात भर बरसा पानी
शरणार्थी कैंप के टेंट में सोते
बच्चों की कमर
उस निर्लज्ज पानी में डूब गई
सब रात में ही अचकचाकर उठ बैठे
बच्चों के पास अब कल के लिए
सूखे कपड़े नहीं हैं|

रुखसाना!
तुम्हारी आँखों के बहते पानी ने
कई आँखों के पानी मरने की
कलई खोल दी है|

इस कविता का शीर्षक ‘निर्लज्ज पानी’ अपने श्लेष के कारण यादगार बन गया है| सीरीज की एक अन्य कविता में रुखसाना की बेटी का जिक्र आया है| इस बेटी के नन्हें हाथों ने स्कूल की कापी में ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की विशेषताओं’ पर लिखा था| वह छोटा-सा प्रश्नोत्तर आज अपना अर्थ तलाश रहा है|

साम्प्रदायिकता पर लिखने वाली दूसरी दलित स्त्री कवियों से अनिता भारती इस अर्थ में भी अलग हैं कि वे (अघोषित) अस्मितावादी बंदिशों से निकलकर निहायत असुविधाजनक सवालों का सामना करती हैं| वे उन दलित नेताओं से सवाल करती हैं जिन्होंने सामाजिक, सामुदायिक और इंसानी सरोकारों को तिलांजलि देकर साम्प्रदायिक ताकतों से हाथ मिला लिया|

बिडंबना ही है कि हिंदुत्व से हाथ मिलाने में लगभग सभी प्रमुख दलित राजनीतिक दल आगे आ चुके हैं| इस संग्रह की ‘अवसरवाद’ नामक कविता में अनिता तथाकथित आंबेडकरवादियों से पूछती हैं- “अब कल ही तुम/ बाजार में खड़े हो/ बोलियाँ लगवा रहे थे अपनी/ उनके सामने/ जो तुम्हें अपने रंग में रंगने के लिए/ उत्सुक थे|” ऐसा नहीं है कि कवि छद्म आंबेडकरवादियों को बहुत बिलंब से पहचान सकी हो| अपने पहले ही संग्रह ‘एक कदम मेरा भी’ (2013) में वह हिन्दुत्ववाद की मजबूती में अपना योगदान करते लोगों को चिन्हित कर चुकी थी-
भूख, प्यास और
दुःख में
सर्दी, गर्मी, बरसात में
जमीन पर, कुर्सी पर
तुमने जी भर
ओढ़ा, बिछाया, लपेटा
अम्बेडकरी चादर को

फिर तह कर चादर
रख दी तिलक पर
और तिलकधारियों के साथ
सुर मिलाया
हे राम! वाह राम!
तुमने छाती से लगाई
तलवार
और तराजू बन गया
तुम्हारा ताज

साम्प्रदायिक हिंसा पर दृढ़ता से अपना पक्ष रखना जोखिम भरे क्षेत्र में प्रवेश करना है| ऐसा जोखिम ईश्वर को बर्खास्त करने, शास्त्रों की निंदा करने या स्मृतियों को आग के हवाले करने में नहीं है| यह जानी हुई बात है बात है कि साम्प्रदायिक दंगों को डिजाइन करने वाले न तो आस्थावान लोग होते हैं और न ईश्वर-विश्वासी|

उन्हें भीतरी तौर पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप धार्मिक उसूलों में यकीन करते हैं या नहीं, कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक लेकिन उन्हें चोट पहुँचती है जब आप उनके वर्चस्व की बुनियाद को बेपर्दा करते हैं, जब आप साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध मोर्चा संभालते हैं| साम्प्रदायिक ताकतों की बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ, सार्वजनिक संसाधनों, संपत्तियों, उपक्रमों को हड़पने वाले ‘देशी’ कारपोरेट के साथ अंतरंगता उनके असली चरित्र को जाहिर कर देती है|

इस शोषणकारी, दमनकारी गठजोड़ पर, गुलाम बनाने वाली स्थिति पर किसिम-किसिम के अस्मितावादी खामोश रहते हैं या फिर अमूर्त सत्ता पर अपना उग्र आक्रोश प्रकट करते हैं| काँख भी दबी होती है और मुट्ठी भी तनी रहती है| दलित स्त्री रचनाकार सुविधाजनक सुरक्षित रास्ते पर न चलकर जोखिम भरे ज़ोन में उतरती हैं| वे जानती हैं कि धर्मसत्ता के समर्थक, दक्षिणपंथी उग्र राष्ट्रवादी ही देश को गिरवी रख रहे हैं, मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए, विश्व-व्यवस्था के आका(ओं) के लिए पलक पांवड़े बिछा रहे हैं|

उग्र राष्ट्रवाद और वैश्वीकरण दोनों में ही वंचितों के, दलितों के और विशेषकर दलित स्त्रियों के हित सुरक्षित नहीं हैं| सुशीला टाकभौरे लिखती हैं- “उनकी आशाओं पर/ आघात किया जाता है/ बार-बार/ कभी संविधान समीक्षा के नाम पर/ कभी एल.पी.जी. की बात से|” (‘हमारे हिस्से का सूरज’, पृ.41) अनिता भारती साम्प्रदायिक दंगे, निजीकरण और भूमंडलीकरण को परस्पर सम्बद्ध मानते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं- “चाहे साम्प्रदायिक दंगे हों या निजीकरण और भूमंडलीकरण के बढ़ते प्रभाव से ख़त्म होते रोजगार के अवसर, या फिर आरक्षण, इन सबसे वह (दलित स्त्री) ही सबसे अधिक प्रभावित होती है|” (‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’, पृ. 295)

अपने सहज-बोध से दलित स्त्रियाँ जानती हैं कि धर्म-आधारित राज्य उनके अधिकारों को सीमित कर देगा और अगर हिंदुत्व का शासन होता है तो उनके पूरे समुदाय के अधिकार छीन लिए जाएंगे| फासीवादी विचारधारा मात्र कुछ लोगों को सारी शक्तियाँ सौंप देगी| ‘थॉट्स ऑन पकिस्तान’ में डॉ. आंबेडकर का यह निष्कर्ष उसका पथ-प्रदर्शक है-
“यदि हिंदू राज की स्थापना सच में हो जाती है तो निस्संदेह यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा| चाहे हिंदू कुछ भी कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समानता और मैत्री के लिए एक खतरा है| यह लोकतंत्र के लिए असंगत है| किसी भी कीमत पर हिंदू राज को स्थापित होने से रोका जाना चाहिए|”

संदर्भ सूची

काव्य संग्रह
‘एक कदम मेरा भी’ (2013), अनिता भारती, बुक्स इंडिया, दिल्ली.
‘एक स्त्री का स्वप्न’, (शीघ्र प्रकाश्य काव्य-संग्रह), चंद्रकांता
‘कहानी बहुत पुरानी है’ (2019), रजनी दिसोदिया, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली.
‘दलित निर्वाचित कविताएं’ (2006), कंवल भारती, इतिहासबोध प्रकाशन, हरियाणा.
‘नील, नीले रंग के’ (2015), हेमलता महिश्वर, शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली
‘पदचाप’ (2008), रजनी तिलक, निधि बुक्स, पटना.
‘पिता भी तो होते हैं माँ’ (2015), रजत रानी मीनू, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली.
‘बिना किसी भूमिका के’ (2011), रजनी अनुरागी, आरोही, नई दिल्ली.
‘मदारी’ (2019), डॉ. पूनम तुषामड़, कदम प्रकाशन, दिल्ली.
‘माँ मुझे मत दो’ (2010) पूनम तुषामड़, सफाई कर्मचारी आंदोलन, नई दिल्ली.
‘रुखसाना का घर’ (2015), अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली.
‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’ (2011), संपादक- रजनी तिलक, रजनी अनुरागी, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली.
‘हमारे हिस्से का सूरज’ (2005), डॉ. सुशीला टाकभौरे, शरद प्रकाशन, नागपुर.
‘हवा सी बेचैन युवतियाँ’ (2014), रजनी तिलक, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली.
आलोचना ग्रंथ
‘आरएसएस और बहुजन चिंतन’ (2019) कँवल भारती, फॉरवर्ड प्रेस, दिल्ली.
‘दलित साहित्य : एक अंतर्यात्रा’ (2015), बजरंग बिहारी तिवारी, नवारुण प्रकाशन, गाजियाबाद.
‘दलित साहित्य का स्त्रीवादी स्वर’ (2008), विमल थोरात, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लि., नई दिल्ली.
‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ (2013), अनिता भारती, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली.
पत्रिका
‘कथादेश’ (जनवरी, 2016), संपादक- हरिनारायण, दिलशाद गार्डन, दिल्ली.
रानी कुमारी की ‘सपने’ शीर्षक कविता का एक अंश उद्धृत किया गया है| इस लेख के लिखे जाने तक यह कविता अप्रकाशित है|
लेख को पढ़ने और सुझाव देने के लिए मैं डॉ. चंचल चौहान का शुक्रगुजार हूँ|

(यह लेख ‘हंस’ के दलित साहित्य विशेषांक में प्रकाशित हो चुका है)

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