बादल की कविता जीवन की कविता है : रविभूषण

  • 19
    Shares

बादल की कविताएं वर्गीय दृष्टि की कविताएं हैं : रामजी राय
‘शंभु बादल का कविकर्म’ पर हजारीबाग में आयोजन

हजारीबाग के डीवीसी, प्रशिक्षण सभागार में 14 अक्टूबर 2018 को वरिष्ठ कवि शंभु बादल के कविकर्म पर जन संस्कृति मंच की ओर से एक आयोजन संपन्न हुआ, जिसका संचालन कवि बलभद्र ने किया। अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक रविभूषण ने की।

रविभूषण ने शंभु बादल को हिंदी की क्रांतिकारी धारा का कवि बताते हुए कहा कि वे संघर्षशील मुक्तिकामी कवियों की उज्जवल कतार में शामिल हैं। भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला और संकटग्रस्त-संघर्षशील प्यारे लोगों के प्रति कवि के हृदय-सागर में लगातार लहरे उत्पन्न होती है, जैसा कि उनकी चयनित कविताओं के संकलन के समर्पण में कहा गया है। उनकी कविता में 71 वर्षीय आजाद विह्वल होकर भगतसिंह को याद करते हैं, इसलिए कि भगतसिंह के सपने पूरे नहीं हुए हैं। बादल की कविता में जो सपने हैं, वे भगतसिंह के सपनों के भारत से जुड़े हुए हैं। भगतसिंह बार-बार उनकी कविताओं में आते हैं।
उन्होंने कहा कि संयोग यह है कि जब बादल अपने सृजन के पचासवें साल में प्रवेश करने वाले हैं, तब उनके कवि कर्म पर केंद्रित यह महत्वपूर्ण आयोजन हो रहा है। कविता के जीवन, अंतर्वस्तु, संतुलन, दृश्यबिंब, प्रतीक और मुहाबरे की दृष्टि से उनकी कविताएं हिंदी की प्रगतिशील काव्यधारा से जुड़ती हैं।
रविभूषण ने कहा कि कविता के जीवन का प्रश्न महत्वपूर्ण है, पर उससे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न जीवन की कविता का है। बादल की कविता जीवन की कविता है।
रविभूषण ने कहा कि एक दौर में केंद्र बनाम परिधि की बहस चली थी। दिल्ली केंद्र है और केंद्र के प्रति कवियों में गुस्सा रहा है। दिल्ली के प्रति बादल का गुस्सा भी हाशिये के कवि का गुस्सा है। उन्होंने उनकी कविता में चिड़ियों की मौजूदगी की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि आकाश में उड़ना विस्तार और आजादी का प्रतीक है।


समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि शंभु बादल की कविताएं अलंकाररहित हैं, यह कोई बुरी बात नहीं है, क्योंकि जीवन से बड़ा कोई अलंकार नहीं होता। दरअसल सहजता ही उनकी कविता का अलंकार है और सरलता उसका लय या संगीत है। बादल का कवित्व गतिमान यथार्थ से जुड़ा हुआ है। वे भाषा को अतिरिक्त आवेशित नहीं करते। भाषा के स्तर पर थोड़ी असजगता जरूर है, पर उनकी कविताएं जिन तर्कों और विडंबनाओं को सामने लाती हैं, वे गौरतलब हैं। उनकी कविताएं वर्गीय दृष्टि की कविताएं हैं। ‘घर’ कविता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वह एक दलित के वर्गांतरण की कविता है। रामजी राय ने बलभद्र द्वारा संपादित ‘शंभु बादल की चुनी हुई कविताएं’ के बारे में कहा कि इसमें पच्चीस-तीस कविताएं अच्छी हैं और यह सामान्य बात नहीं है।
जनवादी लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष प्रो. अली इमाम ने कहा कि बादल की कविताएं संघर्ष और सामूहिक चेतना की कविताएं हैं। वे व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं। पाठक को बेचैन करती हैं, कुछ करने और बदलने को उकसाती हैं। ‘आ बाघ’ कविता के बारे में उन्होंने कहा कि इसमें बाघ हिंसक, खूंखार और क्रूर अंतर्राष्ट्रीय पूंजी का प्रतीक है। ‘घर’ कविता के संदर्भ में उनका कहना था कि गरीबी और सामाजिक बेइज्जती का रिश्ता है। बेशक पहचान की राजनीति की अपनी सीमा है, पर वर्ग की राजनीति उसे पीछे धकेलकर आगे नहीं बढ़ सकती।
प्रलेस के राज्य सचिव मिथिलेश सिंह ने कहा कि जुमलेबाजी वाले राजनैतिक दौर में भी कविता का अपना अस्तित्व है। राजसत्ता की नजर में हम महज एक मतदाता है और बाजार की नजर में उपभोक्ता। पोस्ट ट्रूथ की बात तो दुनिया में बाद में सामने आई, हमारे यहां तो वह 2014 से जारी है। सवाल यह है कि असीमित लूट और झूठ के इस समय में जब बात घुमा-फिराकर कहने से काम नहीं चल रहा है, तो बात को सीधे-सीधे क्यों न कहा जाए? शंभु बादल की कविताएं इसी जरूरी काम को अंजाम दे रही हैं।
जसम के महासचिव चर्चित पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने कहा कि शंभु बादल जन संस्कृति मंच के संस्थापक साथी हैं और हमारे पथ-प्रदर्शक हैं। 50 साल से वे सृजनरत हैं और हर दौर में जनता के दमन-शोषण के खिलाफ संघर्षों पर उन्होंने कविताएं लिखी हैं, यह महत्वपूर्ण बात है।
वरिष्ठ कवि रंजीत वर्मा ने कविताओं को प्रभावशाली बनाने के लिए संपादन की जरूरत पर जोर दिया। बादल की कविता ‘चिड़िया वही मारी गई’ के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वे आर्थिक-सामाजिक भेदभाव को प्रश्नों को एक-साथ मिलाकर देखते हैं। दलित-वामपंथी राजनीतिक धाराओं की एकजुटता की संभावना की ओर उन्होंने पहले ही संकेत किया था।
आलोचक अजय वर्मा ने कहा कि आज के आयोजन में बादल जी और उनकी कविताओं के प्रति सबका प्रेम उभरा है। निःसंदेह वे महत्वपूर्ण कवि हैं। उन्होंने कहा कि जीवन के बारे में बहुत बातें होती हैं, पर कविता के जीवन पर भी बात होनी चाहिए। कविता क्या केवल अपनी अंतर्वस्तु से पहचानी जानी चाहिए? कविता भाषा में लिखी जाती है, लिहाजा उसकी भाषा पर भी बात होनी चाहिए, क्या उसके अंतर्वस्तु और रूप में संतुलन है, इसका भी मूल्यांकन होना चाहिए।
युवा कवि निशांत का कहना था कि शंभु बादल जी सिर्फ कवि नहीं, अपने आप में एक संस्थान हैं। वे एक प्रतिबद्ध कवि हैं और उनके सरोकार आम आदमियों से जुड़े हुए हैं। वे अपनी कविताओं के माध्यम से आम आदमी को लगातार जनविरोधी स्थितियों के प्रति आगाह करते हैं। जिम्मेदार नागरिक होने की जरूरत का अहसास दिलाते हैं। शमशेर या कुंवर नारायण की तरह काव्य तत्व उनमें ढूंढना ठीक नहीं होगा। उनकी कविताएं उनके निज अनुभवों की कविताएं हैं।
शायर अनवर शमीम ने बादल जी को लोक मन का पारखी कवि बताते हुए कहा कि उनकी कविता कठिन समय से टकराने वाली कविता है। आज की कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हर मनुष्य के साथ उनकी कविता खड़ी है। उनकी कविता में मिट्टी की गंध है और प्रतिरोध का कड़क स्वर भी है।


‘लोकचेतना वार्ता’ के संपादक और आलोचक रविरंजन के अनुसार शंभु बादल की कविताओं में स्मृतियों का आलोक और परंपराओं का विकास नजर आता है। ‘जनता का कवि’ कविता की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह विचार करना चाहिए कि दिल्ली कवियों को अच्छी क्यों नहीं लगती। ‘हजारीबाग’ कविता के संदर्भ में उनका कहना था कि इसमें यहां के संत कवि दलेल सिंह का जिक्र होना चाहिए था।
आलोचक और संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन ने कहा कि आज अपने देश में मुसोलिनी, हिटलर जैसों का जो जुल्मी बयार है, ‘झूम रहा बाजार’ और ‘झूम रही सरकार’ के जो प्रधान और प्रवक्ता हैं, बादल जी की कविता उनकी शिनाख्त करती है, ‘वे सब कौन हैं?’ यह बताती है। उन्होंने कहा कि उनकी कविता में सपने उदासी, अकेलपन और संकट के घास-पात को साफ करते हैं। वे कहते हैं- ‘हम दुनिया को देखते हैं/ सपनों के हाथ लिये।’ सपनों को बचा कर रखने के लिए वे सपनों का जीवन बन जाना चाहते हैं। जाहिर है ये सपने बेहतर समाज और दुनिया के हैं, जिन सपनों का जीवन बन जाने की चाहत विरल काव्य-संदर्भ है। सपनों के हाथ बदलाव के लिए लोगों के हाथों की जरूरत महसूस करते हैं।
सुधीर सुमन ने कहा कि किसके बल पर गति की स्याही से कवि जीवन भर लिखता रहा, वह गौर करने लायक है- टोकरी भर धूप, टोकरी भर छाया, ऊर्जा के घने मेघ, ऐसी बिजली की गर्जना जिससे धरती के दागदार वृक्ष फट जाते हैं, खेत झूम उठते हैं, उनकी कविता की ताकत हैं। खेती-किसानी से जुड़े बिंब और प्रतीक उनकी कविता में बड़ी सहजता से आते हैं। ‘चने लगाता आया हूं’ और ‘बीज हंस रहे हैं’ जैसी कविताएं इसका उदाहरण हैं। चिड़ियां उनकी कविता में उत्पीड़ित समुदायों और स्त्रियों के संदर्भ में आती हैं। एक कविता में चिड़िया खुद उनकी पत्नी का प्रतीक है।
विडंबनाओं और वर्ग-वैषम्य की स्थितियों की पहचान कराना उनकी कविताओं की खासियत है। उनकी चुनी हुई कविताओं के संकलन की पहली कविता ‘चांद’ से लेकर ‘प्रिय वेनिस’ जैसी कविता तक में इसे देखा जा सकता है। चांद पर मनुष्य के कदम से कवि को खुशी है तो आशंका भी है कि वह कहीं धुएं से न भर जाए, वेनिस के सौंदर्य में डूबा कवि इस विडंबना की शिनाख्त करना नहीं भूलता कि ‘समृद्ध नगर में कट्टर अविवेक’ है, मानो ‘भव्य नाव में बारीक सुराख’। शासकवर्गीय छल-प्रपंच का लगातार पर्दाफाश करने के कारण भी उनकी कविताएं महत्वपूर्ण हैं।
सुधीर सुमन ने कहा कि शंभु बादल परिवर्तन की उम्मीद और संघर्ष के प्रति सक्रियता का भाव जगाने वाले कवि हैं। ‘मैं ही महेंद्र सिंह हूं’ कविता में वे कहते हैं- ‘‘तुमने/ क्रांति की/ उदास फसलों को/ अपने खून से सींच/ हरा-भरा किया।’ इसी कविता में कवि ने वर्तमान को बहुमार्गी बताया है और इस बहुमार्गी वर्तमान को संवारने वालों की एकता की बात कही है। यह राजनीति और साहित्य दोनों के लिए जरूरी सामयिक वैचारिक संदर्भ है।
कवि लालदीप गोप ने यह चिह्नित किया कि बादल की कविताओं में सर्वहारा की स्थिति को लेकर विलाप नहीं, बल्कि उन स्थितियों को बदल देने की जिजीविषा नजर आती है।
कवि नीलोत्पल रमेश ने शंभु बादल की कविताओं को उद्धृत करते हुए उन्हें हिंदी की प्रगतिशील-जनवादी काव्य परंपरा का महत्वपूर्ण कवि बताया। जनता के संघर्ष, प्रतिरोध और परिवर्तन के प्रति उनकी कविता प्रतिबद्ध है। डाॅ. गजेंद्र सिंहने कहा कि कविता में बाघ वालमाॅर्ट और कारपोरेट्स का प्रतीक है। राजेश रंजन ने कहा कि उनकी कविताओं में सूरत नहीं, सूरत है। राजेश दूबे, अभिषेक पांडेय और डाॅ. हीरालाल साहा ने भी कवि शंभु बादल और उनकी कविताओं के महत्व को रेखांकित किया।
इस मौके पर शिल्पा कुमारी झा ने बादल जी की कविता ‘सांवली लड़की’ और प्रियंका कुमारी ने ‘सपनों से बनते हैं सपने’ का पाठ किया। स्वयं शंभु बादल ने ‘आ बाघ’ और अपनी नई कविता ‘हंसी फैलेगी’ सुनाई।
आयोजन स्थल को संभावना कला मंच, गाजीपुर के निहाल कुमार और मृदुल चौधरी ने कविता-पोस्टरों से सजाया था। इस आयोजन में बादल जी और उनकी कविता को चाहने वालों की भारी तादाद मौजूद थी। आयोजन के आरंभ में जन संस्कृति मंच, झारखंड के सचिव अनिल अंशुमन ने अतिथियों और श्रोताओं का स्वागत किया। धन्यवाद ज्ञापन जावेद इस्लाम ने किया।
इस मौके पर गंगा में प्रदूषण मुक्ति के लिए अनशन के दौरान शहीद प्रोफेसर और पर्यावरण विज्ञानी जी. डी. अग्रवाल को एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।

Related posts

Leave a Comment