पहाड़ और नदियों ने खो दिया अपने कवि को

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नित्यानंद गायेन

 

 

 

स्मृति शेष: कवि सुरेश सेन निशांत

आज जब पहाड़, जंगल और जमीन सहित पूरी मानवता खतरे में है और उन्हें बचाने के लिए संघर्ष जारी है, ऐसे में एक कवि का अचानक चले जाना एक घहरा आघात है. पहाड़ और नदियों ने अपने कवि सुरेश सेन निशांत को खो दिया. बची रह गयी हैं उनकी कविताएं. किन्तु यह सर्वमान्य है कि कवि मर कर भी नहीं मरता, वह सदा मौजूद रहता है हमारे बीच अपनी रचनायों के साथ.

अब इन पंक्तियों को देखिये :

“जहां हम रहते हैं
वहां हमारे पड़ोस में बहती है नदी
बच्चों की तरह चंचल
हड़बड़ी में मैदानों की ओर
भागती हुई

पड़ोस में जंगल है
देवदार के पेड़ों से भरा हुआ
हमारे लिये किसी सगे सा
इस जंगल को कटने से बचाने के लिए
चिपक गईं थी पेड़ों से हमारे इस जनपद
की औरतें
दूर दूर तक गई थी
इस आंदोलन की गूंज”

अब इन पंक्तियों को जब-जब पढ़ेंगे महसूस होगा कि कवि यहीं कहीं मौजूद है हमारे आस-पास.

कवि सुरेश सेन निशांत से मैं कभी नहीं मिला. माने कि उनसे आमने-सामने मेरी कभी मुलाकात नहीं हुई. किन्तु उनसे कई बार फोन पर बात हुई और जब-जब बात हुई कभी लगा नहीं कि हम कभी नहीं मिले हैं. वर्ष 2013 में मेरी कविताएं कहीं पढ़कर उन्होंने मुझे बधाई देने के लिए फोन किया. तब मैंने उनसे कहा था – आप पहाड़ पर रहते हैं, प्रकृति के के गोद में कितना सुंदर और सुखद है यह. तब उन्होंने कहा था – बेशक, यह सुखद तो है पर अब पहाड़ का दर्द कौन समझता है. नदियाँ रो रही हैं, सेब के पेड़ और व्यापारी परेशान हैं. इनकी पीड़ा कौन समझता है. मैंने कहा था मैं आना चाहता हूँ आपसे मिलने. उन्होंने कहा था – आना जरुर , पर अभी बरसात में मत आना, बरसात में यहाँ जिन्दगी बहुत कठिन हो जाती है, सड़कें टूटती हैं, कब क्या हो जाये कुछ पता नहीं, बादल फटने पर पूरा गाँव बह जाता है.

सुरेश जी ने नदियों पर जो कविताएं लिखी हैं उन्हें पढ़कर ही समझा जा सकता है कि कितने नजदीक से कवि ने नदी के दर्द को महसूस किया है. उसी तरह पेड़ और जंगल पर उनकी कविताएँ जो दर्द बयाना करती है वह अद्भुत है. पहाड़ के इस कवि ने बहुत सिद्दत से महसूस किया था बर्फ के दर्द को भी.

दुखों भरी बर्फ़ रोक देती है
स्कूल जाते बच्चों के रास्ते
उनके ककहरों के रंगों को
कर देती है धुँधला
छीन लेती है उनके भविष्य के चेहरों से
मासूम चमक
उनके हथेलियों को
बना देती है खुरदरा
भर देती है ज़ख़्मों से
उनके नन्हें कोमल पाँव ।

दुखों भरी बर्फ़ पर
सूरज की तपिश का
नहीं होता कोई असर
अपने आप नहीं पिघलती ।
वह पिघलती है
बुलन्द हौंसलों से
विचारों की तपिश से
हमारे लड़ने के अंदाज़ से ।

आज जब ग्लेशियर खतरे में हैं और बेचैन हैं नदी, ऐसे में इस कवि का यूँ अचानक चले जाना हमारी वह क्षति है जिसकी भरपाई आसान नहीं है.

कवि कहाँ रहता है ? तो कवि लिखते हैं –

जहां हम रहते हैं
वहां हमारे पड़ोस में बहती है नदी
बच्चों की तरह चंचल
हड़बड़ी में मैदानों की ओर
भागती हुई……

बच्चे कहाँ जाते हैं ?

कवि कहते हैं –

हमारे बच्चे अधिकतर
फौज में जाते हैं
या उठाते है शहरों मे बोझा
कभी कभार कोई चला लेता है टैक्सी
किसी बडे शहर में
इसके इलावा है भी क्या रोजगार है भला
पहाड़ी गांव के बच्चों के लिए

यहां दूर है पानी के सत्रोत
रास्ते बहुत ही कठिन
यही कारण है जो भी हमारा
बच्चा शहर की ओर गया
उसका लौटना मुशिकल

कारगिल में हमारे ही
बच्चे भेजे गये थे युद्ध मे
वे ही झेल सकते थे
ऊंचे पहाड़ों की हवा का दवाब
वे ही हुए शहीद

पिछले यद्ध के बाद
पहाड के हर गाँव को
शहीदों का गांव कह गए थे
रक्षा मंत्री

आजकल यहां के
लगभग सभी गांव
बूढ़ों विधवाओं औऱ
छोटे छोटे बच्चों के गांव है

ये देश के सबसे उदास गांव है

यहां के खेत कभी खूब उर्वर थे
आजकल बन्जर है यहां

औरतें यहां
हंसती है
रोने की तरह
घुट घुट कर करती
रहती है विलाप

यह विलाप
सगा है पहाड़ का

कवि सुरेश सेन निशांत अब भी मौजूद हैं अपनी रचनाओं के साथ हमारे बीच. पहाड़, जंगल और नदी की धारा और वेदना में हम महसूस करते रहेंगे उन्हें सदा. हम भूल भी गए यदि तो पहाड़ के बच्चे उन्हें याद रखेंगे.

कवि सुरेश सेन निशांत पहाड़ के लोक कवि थे, उनकी सहज भाषा शैली ही उनकी कविता की पहचान है.

मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे दिन भर
काम पे गई
थकी माँ पहुँचती है
अपने नन्हे बच्चे के पास ।

सबसे क़ीमती पल होते हैं
इस धरती के वे
उसी तरह के
किसी क़ीमती पल-सा
पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास ।

मैं चाहता हूँ पहुँचना
तुम्हारे पास
जैसे बरसों बंजर पड़ी
धरती के पास पहुँचते हैं
हलवाहे के पाँव
बैलों के खुर
और पोटली में रखे बीज
धरती की खुशियों में उतरते हुए
मैं पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारे पास ।

मैं चाहता हूँ
बारिश के इस जल-सा
धरती की नसों में चलते-चलते
पेड़ों की हरी पत्तियों तक पहुँचूँ
फलों की मुस्कुराहट में उतरूँ
उनकी मिठास बन
तुम्हारे ओंठों तक पहुँचना चाहता हूँ ।

अँधेरे घर में
ढिबरी में पड़े तेल-सा
जलते हुए
तुम्हारे साथ-साथ
अँधेरे से उजाले तक का
सफ़र तय करना चाहता हूँ ।

निराशा भरे इस समय में
मैं तुम्हारे पास
संतों के प्रवचनों-सा नहीं
विज्ञापनों में फैली
व्यापारियों की चिकनी भाषा-सा नहीं
मैं कविता की गोद में बैठी
किसी सरल आत्मीय पंक्ति-सा
पहुँचना चाहता हूँ ।

मैं चाहता हूँ
मैं पहुँचूँ तुम्हारे पास
जैसे कर्ज़े में फँसे
बूढ़े किसान पिता के पास
दूर कमाने गए
बेटे का मनीऑर्डर पहुँचता है ।

आँखों में ख़ुशी के आँसू छलकता
एक उम्मीद-सा
मैं पहुँचना चाहता हूँ
तुम्हारे पास
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारी आँखों में ।

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