कार्पोरेट के लिए गांवों तक लाल कारपेट बिछाने की नीति से हो रही है खेती-किसानी की तबाही

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लखनऊ. हर सप्ताह रविवार को आयोजित होने वाले शीरोज बतकही की बारहवीं श्रृंखला, खेती-किसानी पर आसन्न संकट पर केन्द्रित रही।

बतकही का संचालन करते हुए सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने भूमिका के तौर पर कहा कि खेती-किसानी की नीतियों का वर्तमान स्वरूप किसान हितों के प्रतिकूल है। यह नीति खेती-किसानी की कब्र निर्माण के दूषित नीति के साथ पूरा होने को अभिशप्त जान पड़ता है। इसकी बुनियाद रातों-रात नहीं रखी गई है और न यह राष्ट्रीय नीतियों तक सीमित है। इसके पीछे कार्पोरेट से लेकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नीति और सत्ता का वर्ग चरित्र कार्य कर रहा है ।

प्रमुख समाज सेविका ताहिरा हसन ने बतकही की शुरुआत करते हुए कहा कि 1990 के बाद से किसान हितों के विपरीत हमारी नीतियां तैयार की जाने लगीं। उन्होंने खेती-किसानी पर आसन्न संकट को रेखांकित करते हुए कहा कि नई आर्थिक नीतियों को लागू करने के साथ ही ऐसी नीतियां बनाने का काम तेज हुआ है जिससे खेती को किसानों के चंगुल से मुक्त किया जा सके । इसके लिए खाद और बीज को पहले निशाने पर लिया गया। सबसे जरूरी फास्फोरस खादों के दाम में अप्रत्याशित वृद्धि की गई तो किसानों के परंपरागत बीजों को छीन लिया गया । डंकल बीजों के आने के बाद ही किसानों का अपने बीजों से परंपरागत अधिकार समाप्त हो गया। रसायनिक खादों और कीटनाशकों की अनिवार्यता इस तरह बढ़ाई गई कि जमीन की उर्वरकता दिन-प्रतिदिन घटती गई। जमीन जहरीली होती गई और कैंसर जैसी घातक बीमारियां हमारे गले पड़ीं।

उन्होंने कहा कि किसान के सामने खेती-किसानी की ऐसी नीतियां रख दी गईं जिससे वह खेती-किसानी को छोड़ने को मजबूर हो जाये। सिंचाई के परंपरागत श्रोत छीन लिए गए। तालाब और नदियां दम तोड़ने लगीं । ट्यूबवेल से सिंचाई, डीजल को महंगा कर महंगा बना दिया गया। खेती-किसानी में सबसे ज्यादा उपेक्षा महिलाओं की हुई और उन्हें किसान तक का दर्जा नहीं दिया गया जबकि आज भी धान की रोपाई या निराई-गुड़ाई जैसे तमाम कार्य महिलाएं ज्यादा करती हैं। घर के पुरुषों के शहर चले जाने पर खेती-किसानी को वे ही संभाल रही हैं इसके बावजूद उन्हें किसान का दर्जा नहीं दिया जाता है।

उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर कार्पोरेट की निगाह, किसानों की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर गड़ी थी और उन्होंने ऐसी नीतियां तैयार करा ली हैं कि किसान स्वयं खेती छोड़ दे और वे धीरे-धीरे जमीन का अधिग्रहण करते जाएं। आज झारखंड की उपजाऊ जमीनें कार्पोरेट हथिया रहा है । झारखंडी मजदूर बनने को मजबूर हैं जो सस्ते में कार्पोरेट को मिल रहे हैं। इस प्रकार कार्पोरेट जहां खेती-किसानी को महंगा बना कर किसानों की जमीनें हड़प रहा है वहीं किसानों को सस्ते मजदूर में तब्दील कर कार्पोरेट को कम दामों में उपलब्ध करा रहा है। उड़ीसा के पान की खेती करने वालों की भी जमीनों पर कार्पोरेटकी नजर है। झारखंड की दामोदर नदी नाले में तब्दील कर दी गई है। जो जमीन कभी किसानों की जीविका का साधन थी, आज उसमें खेती करना मुश्किल बना दिया गया है।

ताहिरा हसन ने कहा कि स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को लागू नहीं किया गया है जिससे किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिले । एक ओर रिलायंस जैसी कंपनियां किसानों से सस्ते में सब्जियों और कृषि उत्पाद खरीद कर महंगे दामों पर अपने वातानुकूलित माॅल में बेच रही हैं वहीं किसान को खेती का लागत मूल्य भी नहीं मिल पा रहा । आज कार्पोरेटपरस्त नीतियों का ही परिणाम है कि नदी, तालाब, झीलें सभी खत्म की जा रही हैं। आज महंगे खाद, पानी, बीज और कीटनाशक जो खरीद पायेगा, वही खेती करेगा और ये चीजें कार्पोरेट के नियंत्रण में हैं। यही नहीं मीडिया भी कार्पोरेट के नियंत्रण में है और चैनलों पर खेती-किसानी के जरूरी मुद्दे गायब कर दिए जा रहे हैं । वहां नकली मुद्दे पैदा कर बताया जा रहा है कि कार्पोरेट ही किसानों का भला करेगा । आज इन्हीं किसान विरोधी नीतियों का परिणाम है कि छोटे और मझोले किसान आत्महत्या कर रहे हैं। मीडिया में किसानों की आत्महत्या और तबाही की चर्चा न के बराबर हो रही है। ताहिरा हसन का मानना था कि जब तक किसान सदन में नहीं पहुंचेगा तब तक उसकी वास्तविक समस्याओं की चर्चा नहीं होगी और न उसके हित में नीतियां बनेंगी। मगर सवाल फिर खड़ा होता है कि सदन में किसान पहुंचेगा कैसे? अब जब चुनाव करोड़ों का खेल हो चुका हो तब कोई गरीब किसान सदन में नहीं पहुंच सकता।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने कहा कि पहले सदन में धोती पहने किसान दिख जाते थे। कुछ गरीब किसान भी चुन लिए जाते थे। अब ऐसी संभावनायें खत्म कर दी गई हैं। अब तो कार्पोरेट चुनाव में स्वयं अपने नुमाइन्दे खड़ा करने लगा है। उसने सदन पर भी कब्जा जमा लिया है। किसानों को कर्ज देने का खेल भी प्रायोजित जरूरत बना दिया गया है। जब आप खेती-किसानी को इतना महंगा कर देंगे कि किसान को मजबूरन कर्ज लेना पड़े, फिर आप कृषि बीमा के चोंचले लायेंगे जो कार्पोरेटपरस्त होगा और अंत में किसानों को आत्महत्या तक पहुंचा देंगे।

आशा कुशवाहा ने किसानों की नई पीढ़ी का खेती-किसानी से पलायन का जिक्र करते हुए कहा कि अब लड़के गोबर-घारी नहीं करना चाहते हैं। उन्हें कीचड़ और मिट्टी लगे हाथ पसंद नहीं है । नई पीढ़ी खेती-किसानी के बदले शहरों में जाकर मजदूरी करना ज्यादा बेहतर समझती है। यह नीति भी कार्पोरेट हितैषी है। यानी श्रम से नफरत पैदा करने की संस्कृति का यह किसान विरोधी रूप है। शहरों में पलायन का परिणाम यह हो रहा है कि इससे कार्पोरेट को सस्ते मजदूर उपलब्ध हो रहे हैं। सुबह-शाम की मजदूरी में नगद पैसा मिल जाता है जबकि सब्जियों या धान-गेहं उगाने से तुरंत कमाई संभव नहीं है। खेती के लिए नहरों का जो जाल बिछा, वह गाद से भर जाने के कारण किसी काम का न रहा। अब टेल तक पानी नहीं पहुंचता। खाद, पानी और बीज इतने महंगे बना दिए गए हैं कि लागत के बराबर भी दाम नहीं दे पा रही। हाइब्रीड बीजों ने किसानों को पंगु बना दिया है । इन बीजों को ज्यादा पानी, खाद और पेस्टीसाइड चाहिए। इससे एक ओर हमारे खाद्य पदार्थ विषैले हो रहे हैं वहीं दवा कंपनियों की दवाओं की बिक्री बढ़ रही है । कुल मिलाकर यहां भी बीमारी पैदा कर लाभ कमाने की नीति इस्तेमाल की जा रही है।

प्रभात त्रिपाठी ने कहा कि प्रारंभिक पंचवर्षीय योजनाओं को छोड़ दें तो खेती-किसानी के बजाय औद्योगिक उत्पादन पर हमने ज्यादा फोकस किया। खेती-किसानी से विमुख होने की नीति का ही परिणाम रहा कि यह मुख्यधारा से बाहर होती गई। इससे कमाई को खत्म कर मात्र भोजन तक सीमित कर दिया गया। इससे गांव से पलायन को तेज करने का मौका मिला। बच्चों को हमने बाहर भेजना शुरु किया क्योंकि गांव में कमाई संभव न रही । बच्चों का भविष्य शहरों में दिखने लगा। आज गांवों से इतना पलायन हो चुका है कि गांव में भी खेती-किसानी हेतु मजदूरों का अकाल हो गया है। कार्पोरेट चाहता है कि किसान खेती छोड़ दें जिससे कांट्रैक्ट खेती की ओर बढ़ा जाये। कांट्रैक्ट खेती के बाद कार्पोरेट खेती का जमाना लागू होगा और किसान पूरी तरह से मजदूर बन कर रह जायेंगे। आज पैसे वाले जो बड़े-बड़े फार्म हाउस बना रहे हैं, वे ही आने वाले दिनों में कार्पोरेट खेती की आधारशिला तैयार करेंगे। आने वाले दिनों में किसानों के नाम पर एन.जी.ओ. को धन उपलब्ध कराया जाने वाला है ।

कुल मिलाकर शीरोज बतकही की बारहवीं कड़ी का निष्कर्ष यह रहा कि अन्नदाता को तबाह कर गांवों तक कार्पोरेट के लिए लाल कारपेट बिछाने की नीतियां मनुष्यता विरोधी हैं और गरीबों का रक्त चूस कर अमीरों को समृद्ध बनाना है।

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