यथार्थवाद की आधारशिला है सेवासदन – ज्ञानेन्द्रपति

वाराणसी : हिन्दी के अप्रतिम कथाकार प्रेमचन्द की 138वीं जयन्ती पर ‘‘क’’ कला वीथिका, लंका में उनके प्रथम हिन्दी उपन्यास ‘‘ सेवासदन ’’ पर आधारित फिल्म का प्रदर्शन व परिचर्चा का आयोजन किया गया.  सेवासदन आज से 100 वर्ष पहले लिखा गया उपन्यास है जिसमें प्रेमचन्द ने सामाजिक विडम्बनाओं पर करारा प्रहार किया है. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रख्यात कवि ज्ञानेन्द्रपति ने सेवासदन की चर्चा करते हुए उन्होंने इसे यथार्थवाद की आधारशिला के रूप में निरूपित किया.  सेवासदन आज भी हिन्दी साहित्य के लिए आदर्श है.  उन्होंने सेवासदन और तत्कालीन…

Read More

प्रेमचंद ने राष्ट्रवाद की अवधारणा के फासीवादी चरित्र को काफी पहले ही देख लिया था : प्रो. रविभूषण

प्रेमचंद ने आज से काफी पहले ही आवारा पूंजी के ग्लोबल चरित्र और उसके साम्राज्यवादी गठजोड़ की शिनाख्त कर ली थी . उन्होंने राष्ट्रवाद की अवधारणा के फासीवादी चरित्र को काफी पहले ही देख लिया था.

Read More

किसान के क्रमिक दरिद्रीकरण की शोक गाथा है ‘ गोदान ‘

प्रेमचंद ने गोदान में उपनिवेशवादी नीतियों से बरबाद होते भारतीय किसानी जीवन और इसके लिए जिम्मेदार ताकतों की जो पहचान आज के 75 साल पहले की थी वह आज भी हमें इसीलिए आकर्षित करती है कि हालत में फ़र्क नहीं आया है बल्कि किसान का दरिद्रीकरण तेज ही हुआ है और मिलों की जगह आज उसे लूटने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आ गई हैं. यहाँ तक कि जातिगत भेदभाव भी घटने की बजाय बढ़ा ही है. उसे बरकरार रखने में असर रसूख वाले लोगों ने नए नए तरीके ईजाद कर लिए हैं.

Read More

‘ बलिदान ’ : किसान-जीवन त्रासदी और प्रेमचंद की कहानी कला

मेरी अपनी समझ से हिंदी कहानी में ‘जादुई यथार्थवाद’ कला का भ्रूण इस कहानी में देखा जा सकता हैं ,साथ ही कहानी कला की ऊँचाई और उत्कृष्टता भी. और इसका उपयोग करके प्रेमचंद यह सच्चाई बता जाते हैं कि किसान की आत्मा उसके खेतों में होती है, और उसे किसी छल-बल से उसके हक से वंचित नहीं किया जाना चाहिये.

Read More

प्रेमचंद : साम्प्रदायिकता और संस्कृति (वीडियो प्रस्तुति -नासिरुद्दीन )

प्रेमचंद के दौर में भी फिरकापरस्ती यानी साम्प्रदायिकता, नफरत फैलाने और बाँटने का अपना जरूरी काम बखूबी कर रही थी. आजादी के आंदोलन की पहली पांत के लीडरों की तरह ही प्रेमचंद का भी मानना था कि स्वराज के लिए इस मसले का खत्म होना जरूरी है.

15 जनवरी 1934 को छपा उनका एक लेख है- साम्प्रदायिकता और संस्कृति. यह लेख काफी मशहूर है और अक्सर हम इससे टकराते हैं.

Read More

प्रेमचंद और अक्तूबर क्रांति

साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद विरोधी रवैये का एक निरंतरता में अनुपालन जितना प्रेमचंद के यहाँ दीखता है, वैसा हिंदी के किसी और लेखक में नहीं. असंख्य मजदूर, किसान, स्त्रियाँ पहले-पहल जबकि समाज में उनके नायकत्व की संभावना क्षीण थी प्रेमचंद की रचनाओं में यह नायकत्व हासिल कर रहे थे. उनके उपन्यास ‘ रंगभूमि ’ के केंद्र में नायक सूरदास हैं.

Read More