विष्णु खरे: बिगाड़ के डर से ईमान का सौदा नहीं किया

विष्णु जी नहीं रहे। हिंदी साहित्य संसार ने एक ऐसा बौद्धिक खो दिया, जिसने ‘बिगाड़ के डर से ईमान’ की बात कहने से कभी भी परहेज़ नहीं किया। झूठ के घटाटोप से घिरी हमारी दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम रह गए हैं। निर्मम आलोचना की यह धार बगैर गहरी पक्षधरता और ईमानदारी के सम्भव नहीं हो सकती थी। बनाव और मुँहदेखी उनकी ज़िंदगी से ख़ारिज थे। चुनौतियों का सामना वे हमेशा सामने से करते थे। अडिग-अविचल प्रतिबद्धता, धर्मनिरपेक्ष-प्रगतिशील-जनवादी दृष्टि और विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष करने का अप्रतिम साहस हमारे…

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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को क्या स्वतंत्र चेतना से डर लगने लगा है

यह मसला सिर्फ एक व्यक्ति के अपमान का नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को क्या स्वतंत्र चेतना से इतना डर लगने लगा है कि वह विचार विमर्श के मंच पर भिन्न मत का सामना करने से बचना चाहता है? क्या वह अनैतिक और असभ्य तरीकों से स्वतंत्र अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने वाले देशों की सूची में अपना नाम लिखवाने की राह पर चल पड़ा है ? यह एक ऐसा सवाल है जिससे प्रत्येक लोकतांत्रिक भारतीय को चिंतित होना चाहिए, उसकी राजनीतिक विचारधारा जो भी हो।

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