‘ भीड़-तंत्र’ को कैसे समझें !

कॉर्पोरेट मीडिया की अगुआई में इन दिनों सत्ता के सभी संस्थान एक हाथ से साम्प्रदायिक नफ़रत बाँट रहे हैं, दूसरे हाथ से भारत की सम्पदा-सम्प्रभुता का सौदा कर रहे हैं – देशभक्ति के नाम पर यह काम खुलेआम हो रहा है। सवाल यह है कि नफ़रत के ‘विकास’ की दक्षिणपंथी राजनीति क्या केवल अफ़वाह के दम पर संचालित है ? आमतौर पर यही माना जा रहा है जो कि पूरी तरह सही नहीं है ! हमें इस सवाल का जवाब चाहिए कि नफ़रत के ‘ ग्राहक ’ का उत्पादन कैसे हो रहा है, कहाँ हो रहा है ? दूसरी बात यह कि किसी टीकधारी को देशभक्ति की पुड़िया खिलाना इतना सरल क्यों हो रहा है ? यह ‘देशभक्त’ हिंसा हत्या की बन्द गली में ऐसे कैसे फँस जा रहा है कि असत्य-अन्याय की जयकार ही उसका कर्तव्य हो रहा है ? वैचारिक रूप से अन्धे और मानसिक रूप से बहरे इस ‘फासिस्ट’ की निर्मिति में उस राजनीति की भी कोई भूमिका बन रही है क्या – जो सामाजिक न्याय और अम्बेडकरवाद के नाम पर की जा रही है ? भक्ति भाव में पगी, देशभक्ति की सगी सामाजिक चेतना निजीकरण के किन स्रोतों से पोषित है, भेदभाव के किन मूल्यों से प्रेरित है जो इन दिनों ‘भीड़-तंत्र’ का हिस्सा बनने को अभिशप्त है.

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भीड़-दंड को प्रोत्साहित करता राज्य तंत्र

लिंचिंग में शरीक अधिकांश के लिए यह दंडमुक्त अपराध है. राज्यतंत्र ने इस दोहरेपन के साथ तालमेल बिठा लिया है. विभिन्न राजनीतिक संगठनों, सोशल मीडिया की पहलकदमियों और नागरिक संगठनों ने इसके खिलाफ चौतरफा प्रतिवाद किया है. घृणा-राजनीति फैलाने की मशीनरी के खिलाफ जन-विमर्श को परिपक्व करना लिंचिंग पर लगाम के लिए जरूरी हो गया है.

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भीड़ हमला-हत्या की घटनाएँ निर्देशित घटनाएँ हैं

इन निर्देशित गिरोहों को बाकायदे हत्या की मशीन में तब्दील किया जा रहा है. गौरी लंकेश के हत्यारे का बयान इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसमें वह कहता है कि उसे पता भी नहीं था कि जिसकी हत्या करने वह जा रहा है वो आदमी है कौन, सिवाय इसके कि उसे जिसकी हत्या करनी है वह हिन्दू-विरोधी है. स्वामी अग्निवेश पर हमला करने वाले भी यही कह रहे थे कि ये हिंदू-विरोधी हैं.

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जाति, धर्म और व्यवस्था की कोख से पैदा हो रही मॉब लिंचिंग जैसी बर्बर संस्कृति

गरीब और कमजोर पर जुल्म करने की प्रवृत्ति का फैलाव इसलिए बढ़ा है कि न्यायिक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है. जब तक अत्याचारी आगे बढते जायेंगे और सीधा-सादा समाज पीछे ढकेला जायेगा, यह प्रवृति रुकेगी नहीं. जब हम लिंचिंग करने वालों को मिठाई खिलायेंगे तब समाज में हिंसा स्वीकार्य होती जायेगी.

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