‘ संस्कृति खरगोश की तरह है, जो आने वाले खतरे का आभास देती है ’

कौशल किशोर   यह कैसा समय है कि साथ के लोग साथ छोड़े जा रहे हैं. कुंवर जी और दूधनाथ सिंह को हम ठीक से अभी याद भी नहीं कर पाये थे कि हमारे अत्यंत प्रिय कवि केदारनाथ सिंह के निधन की बुरी खबर मिली. कई बार लगता है कि हम पके आम के बाग में हैं. कब कौन टपक पड़े कहना मुश्किल है. अब तो अधपके और कच्चे भी गिर रहे हैं. सुशील सिद्धार्थ के दाह संस्कार की राख अभी ठण्डी भी नहीं हो पाई कि दूसरे ही दिन…

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‘आदमी के उठे हुए हाथों की तरह’ हिन्दुस्तानी अवाम के संघर्षों को थामे रहेगी केदारनाथ सिंह की कविता : जसम

कवि केदारनाथ सिंह को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि जनतांत्रिक मूल्यों की अकाल-वेला में केदारनाथ सिंह की कविता जनप्रतिरोध के सारसों की अप्रत्याशित आवाज़ थी. उनका संग्रह ‘अकाल में सारस’ 1988 में प्रकाशित हुआ था, जिसमें इसी शीर्षक की एक कविता है. कविता इस तरह शुरू होती है- “तीन बजे दिन में आ गए वे जब वे आए किसी ने सोचा तक नहीं था कि ऐसे भी आ सकते हैं सारस एक के बाद एक वे झुंड के झुंड धीरे-धीरे आए धीरे-धीरे वे छा गए सारे आसमान में धीरे-धीरे उनके…

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‘ कविता भविष्य में गहन से गहनतर होती जाएगी ’

  ( प्रख्यात कवि प्रो. केदारनाथ सिंह ने 26 फरवरी 2016 को गोरखपुर के प्रेमचंद पार्क में प्रो परमानंद श्रीवास्तव की स्मृति में ‘ कविता का भविष्य ’ पर व्याख्यान दिया था. यह आयोजन प्रेमचंद साहित्य संस्थान ने किया था. इस व्याख्यान में भविष्य की कविता पर उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें की थी. प्रस्तुत है व्याख्यान का प्रमुख अंश )   आज का समय अपने सारे गड्डमड्ड स्वरूप के भीतर से अपनी सच्ची कविता खोज रहा है. इस कविता की तलाश बड़े पैमाने पर जारी है. यह कार्य नई पीढ़ी…

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मै गांव-जवार और उसके सुख-दुख से जुड़ा हुआ हूं

(ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद डॉ केदारनाथ सिंह से यह संक्षिप्त बातचीत टेलीफ़ोन पर हुई थी. यह साक्षात्कार दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ था. )   प्रश्न: ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के बाद आपको कैसा लग रहा है. डा. केदारनाथ सिंह: अच्छा लग रहा है. अच्छा लगने का कारण यह है कि यह केवल हिन्दी नहीं बल्कि देश की सभी भाषाओं के बड़े साहित्यकारों को मिल चुका है. इन सभी साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. भारतीय साहित्य के मनीषियों की परम्परा से जुड़ कर अच्छा लग रहा…

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अलविदा, स्टार गुरु जी !

  मैंने 1989 के जुलाई महीने में जे एन यू के भारतीय भाषा विभाग के हिंदी विषय में एडमिशन लिया. कोर्स एम ए का था. इससे पहले मैं इलाहाबाद में गधा पचीसी के 23 साल बिता चुका था पूरब के तथाकथित ऑक्सफ़ोर्ड से काफ़ी अच्छी तरह से ऊब चुका था. जे एन यू के हिंदी विभाग में एडमिशन के लिए कोशिश का बड़ा आकर्षण नामवर जी, केदार नाथ सिंह और मैनेजर पाण्डेय थे जो न सिर्फ़ भारतीय भाषा केंद्र के आकर्षण थे बल्कि समाज विज्ञान, इतिहास और विज्ञान के छात्र…

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उठो कि बुनने का समय हो रहा है

केदारनाथ सिंह की कुछ कवितायेँ   मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिला मैं लिखने बैठ गया हूँ मैं लिखना चाहता हूँ ‘पेड़’ यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है मैं लिखना चाहता हूँ ‘पानी’ ‘आदमी’ ‘आदमी’ – मैं लिखना चाहता हूँ एक बच्चे का हाथ एक स्त्री का चेहरा मैं पूरी ताकत के साथ शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका जो शब्द और आदमी की टक्कर से…

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