‘ वह आग मार्क्स के सीने में जो हुई रौशन, वह आग सीन-ए-इन्साँ में आफ़ताब है आज ’

जटिल दार्शनिक-आर्थिक तर्क-वितर्क के संसार में रहने के बावजूद मार्क्स ने कई कविताएँ लिखीं और उन पर भी बहुत सी कविताएँ लिखी गयीं, जिनमें से कुछ यहाँ दी गयी हैं. हिंदी में मार्क्स पर बहुत कम कविताएँ मिलती हैं और बकौल सुरेश सलिल, हिंदी कविता लेनिन से पीछे नहीं गयी। ‘उर्दू में अल्लामा इकबाल शायद पहले बड़े शायर हैं जिन्होंने नज्मों में मार्क्स का ज़िक्र किया, लेकिन उनका अंदाज़ कहीं तारीफ़ और कहीं सख्त आलोचना का है। यहाँ प्रस्तुत रचनाओं में ज़्यादातर मार्क्स के ऐतिहासिक अवदान का रेखांकन हैं, हालांकि कुछ में विडम्बना और आलोचना का स्वर भी है।

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एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल : अर्थशास्त्र की आलोचना

मार्क्स ने पाया कि सभी युगों के चिंतक अपने समय की विशेषता को शाश्वत ही कहते आए हैं. अपने समय के राजनीतिक अर्थशास्त्रियों के बनाए इस व्यक्ति की धारणा के विपरीत मार्क्स ने कहा कि समाज से बाहर व्यक्ति द्वारा उत्पादन उसी तरह बेवकूफाना बात है जैसे लोगों के एक साथ रहने और आपसी संवाद के बिना भाषा के विकास की कल्पना करना. वे वैयक्तिकता को सामाजिक परिघटना मानते थे. जिस तरह नागरिक समाज का उदय आधुनिक दुनिया में हुआ उसी तरह पूंजीवादी युग का मजदूरी पर आश्रित स्वतंत्र कामगार भी दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपज है. उसका उदय सामंती समाज के विघटन और सोलहवीं सदी से विकासमान उत्पादन की नई ताकतों के चलते हुआ है. आधुनिक पूंजीवादी व्यक्ति के उदय की समस्या को सुलझाने के बाद मार्क्स कहते हैं कि वर्तमान उत्पादन सामाजिक विकास के एक निश्चित चरण के अनुरूप है. इस धारणा के सहारे वे उत्पादन की अमूर्त कोटि को किसी खास ऐतिहासिक क्षण में उसके साकार रूप से जोड़ देते हैं .

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दो सौ साल बाद मार्क्स का अर्थशास्त्र

2018 में लुलु.काम से माइकेल राबर्ट्स की किताब ‘ मार्क्स200: -ए रिव्यू आफ़ मार्क्स इकोनामिक्स 200 ईयर्स आफ़्टर हिज बर्थ ’ का प्रकाशन हुआ. किताब में मार्क्स के अर्थशास्त्र का संक्षिप्त परिचय देने के बाद पूंजीवाद की गति के नियमों (मूल्य का नियम, पूंजी संचय का नियम और मुनाफ़े की घटती दर का नियम) का विवरण देने के बाद संकट के उनके सिद्धांत का विवेचन किया गया है. इसके बाद मार्क्स के आलोचकों के तर्कों का जायजा लिया गया है. इसके बाद पूंजीवाद के बारे में मार्क्स की उन बातों का उल्लेख है जो अब भी प्रासंगिक लगती हैं. इनमें विषमता और साम्राज्यवाद के साथ उसकी अभिन्नता, धरती के विनाश, मशीन के आगमन तथा वर्ग संघर्ष की निरंतरता पर जोर दिया गया है.

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मार्क्स का चिंतन सिर्फ आर्थिक नहीं सम्पूर्ण मनुष्यता का चिंतन है: रामजी राय

मार्क्स ने मुनष्य को एक समुच्चय में नहीं एक सम्पूर्ण इकाई के रूप में समझा और कहा कि वह एक ही समय में आर्थिक, राजनीतिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक होता है. उसे टुकड़ो-टुकड़ों में अलग-अलग नहीं देख सकते. मार्क्स का चिंतन सिर्फ आर्थिक चिंतन नहीं सम्पूर्ण मनुष्यता का चिंतन है.

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पहली जंगे आज़ादी और मार्क्स

भारतीय संदर्भ में मार्क्सवाद के बारे में चर्चा करते हुए आम तौर पर यह कहा जाता है कि मार्क्स तो भारत को नहीं समझते थे, उसमें जाति और उसके वर्चस्व के बारे में वे नहीं जानते थे.लेकिन भारत में होने वाले जातीय भेदभाव को मार्क्स बखूबी समझते थे. इसलिए वे साफ़ तौर पर “जात-पात” के “भेदभाव और दासता” का उल्लेख कर रहे थे और भारत के पिछड़ेपन के कारण के तौर पर चिन्हित कर रहे थे.

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