विश्वविद्यालयों में काँचा इलैया की किताबों से कौन डरता है ?

लक्ष्मण यादव विश्वविद्यालय एक लोकतान्त्रिक मुल्क में अपने समय-समाज के अंतर्विरोधों से संवाद करते हुए तार्किक-वैज्ञानिक विवेक सम्पन्न बोध से लैस नागरिक तैयार करते हैं। जिन मुल्कों में सामाजिक-सांस्कृतिक विषमता जितनी ज्यादा होगी, उन मुल्कों में ज्ञान के ऐसे प्रतिष्ठानों की ज़िम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। आज़ाद भारत जैसे अंतर्विरोधों के मुल्क में विश्वविद्यालयों को ये बड़ी ज़िम्मेदारी निभानी थी, लेकिन वे उतने खरे न उतरे। तमाम विरोधी विचारों, मान्यताओं व सांस्कृतिक बोध को विश्वविद्यालयों में सबसे पहले जगह देनी थी, उनमें भी वंचित-शोषित दलित-पिछड़े-आदिवासी-अल्पसंख्यक-महिला तबके के लिए यह…

Read More

दलित-बहुजन बौद्धिकता के विमर्श का दमन है प्रो. कांचा इलैया की पुस्तकों को पाठ्यक्रम से हटाना

नई दिल्ली. जन संस्कृति मंच ने दिल्ली विश्वविद्यालय की स्टैंडिंग कमिटी द्वारा प्रो. कांचा इलैया की पुस्तकों को एम.ए राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम से हटाए जाने की निंदा करते हुए इसे भारत में उभर रही दलित-बहुजन बौद्धिकता के विमर्श का दमन बताया है. जसम की ओर से रामनरेश राम द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय कि स्टैंडिंग कमिटी ने अपनी मीटिंग में यह प्रस्ताव पास किया है कि कांचा इलैया की तीन किताबें ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं हूँ ’, ‘ पोस्ट हिन्दू इंडिया’ ,…

Read More