हम तो क्या भूलते उन्हें ‘हसरत’, दिल से वो भी हमें भुला न सके

जंगे-आज़ादी के एक मजबूत सिपाही होने के साथ-साथ एक अज़ीम शायर रहे हसरत मोहानी 13 मई 1951 को इस दुनिया से रुखसत कर गए. ‘ इंक़लाब ज़िंदाबाद ’ का नारा देने वाले हसरत मोहानी हमारे दौर के प्रतिरोध की आवाजों के लिए एक बेहद शानदार शख्सियत हैं.

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