साम्प्रदायिक मनोवृत्ति से मुक्ति की तलाश

समाज में बढ़ते साम्प्रदायिक मनोवृत्ति को कैसे रोका जाये? कैसे नई पीढ़ी में भरी जा रही हिन्दू-मुस्लिम विभाजन, नफरत और भेद-भाव को कम किया जाये, इसी बिन्दु के इर्द-गिर्द शीरोज बतकही की 11वीं कड़ी में रविवार को चर्चा हुई।

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सत्ता पाने का औजार है साम्प्रदायिकता

लखनऊ में शीरोज बतकही की दसवीं कड़ी लखनऊ. हर रविवार आयोजित होने वाले शीरोज बतकही की दसवीं कड़ी में साम्प्रदायिक राजनीति के वर्तमान निहितार्थ पर बातचीत हुई. बातचीत की शुरुआत सामाजिक कार्यकर्ता दीपक कबीर ने की । उन्होंने कहा कि आइडेंटिटी पाॅलिटिक्स के नये उभार का रास्ता, साम्प्रदायिक उभार के रास्ते से संभव हो रही है। उन्होंने कहा कि पहले भी आइडेंटिटी पाॅलिटिक्स होती थी मगर तब वह सत्ता पाने का उपकरण नहीं होती थी। अब स्थिति बदल चुकी है। ब्रिटिश भारत में 1918-20 के आसपास, देश में साम्प्रदायिक संस्थाओं…

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गांव की साझी सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन गति और उसके संकट को केन्द्र में रखती है हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’

(हाल ही में ‘पल-प्रतिपल’ में प्रकाशित हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’ को हमने समकालीन जनमत पोर्टल पर प्रकाशित किया , जिस पर पिछले दिनों पोर्टल पर काफी चर्चा हुई और बहसें भी आयीं। बहस को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है कहानी पर युवा आलोचक और ‘कथा’ के संपादक दुर्गा सिंह की टिप्पणी: सं) कहानी गांव की साझी सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन गति और उसके संकट को केन्द्र में रखती है।यह संकट विभाजनकारी साम्प्रदायिक राजनीति द्वारा पैदा किया गया है। यह संकट पहले भी मौजूद था, लेकिन वह गांवों के सामूहिक ताने-बाने…

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समाज का सच सामने लाती है हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’

(कथाकार हेमंत कुमार की कहानी  ‘ रज्जब अली  ’ पत्रिका ‘ पल-प्रतिपल ’ में प्रकाशित हुई है. इस कहानी की विषयवस्तु, शिल्प और भाषा को लेकर काफी चर्चा हो रही है. कहानी पर चर्चा के उद्देश्य से समकालीन जनमत ने 22 जुलाई को इसे प्रकाशित किया था. कहानी पर पहली टिप्पणी युवा आलोचक डॉ. रामायन राम की आई  जिसे हमने प्रकाशित किया है,  दूसरी टिप्पणी जगन्नाथ दुबे की आई जो डॉ. रामायन राम द्वारा उठाए गए सवालों से भी टकराती है . इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है…

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