फ़ासीवाद की ओर यात्रा: चौराहे पर अमेरिका

बड़े व्यवसायी, तानाशाह सरकार और फौजी ढांचे का यही संयुक्त मोर्चा सभी देशों में फ़ासीवादी शासन के उभार के वक्त नजर आया है. इसके अलावे चर्च, भूपति और बादशाहत जैसे शक्ति के पारंपरिक उपकरणों पर भी इसकी प्रचुर निर्भरता रही है. हां यह है कि आज के फ़ासीवाद की गतिशीलता अधिक मजबूत, विकसित और तकनीकी हो चली है. लेखक का मानना है कि दोनों विश्वयुद्धों के बीच के फ़ासीवाद के कुछ तत्व इस दौर के अमेरिकी और यूरोपीय फ़ासीवाद में अभी स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ रहे. इनमें उन्होंने नेता की व्यक्ति पूजा, एक ही पार्टी का एकाधिकार, समानांतर सैन्य टुकड़ियां, वर्दी जैसे प्रतीक और विकराल राजकीय प्रचार तंत्र आदि को गिनाया है.

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‘समय है सम्भावना का’ : सत्ता के मौन की पहचान है

जगदीश पंकज जी का कविता संग्रह ‘समय है सम्भावना का’ इसी वर्ष आया है. जगदीश पंकज जी नवगीतकार हैं. दलित साहित्य में नवगीत की कोई समृद्ध परंपरा नहीं दिखती है. लेकिन जगदीश पंकज जी ने दलित साहित्य में इस नयी विधा को जोड़कर बहुत बड़ा योगदान दिया है. इससे दलित साहित्य का परिदृश्य व्यापक हुआ है. दलित साहित्य ने अपने आरंभ में स्वानुभूति की अभिव्यक्ति पर बल दिया और इसी को दलित साहित्य का मुख्य प्रस्थान विन्दु बनाया इसलिए साहित्य के अनगढ़पन को स्वकृति भी मिली. लालित्य और गेयता को…

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