अपने-अपने रामविलास: प्रणय कृष्ण

आज रामविलास जी का जन्मदिन पड़ता है.  इस अवसर पर प्रणय कृष्ण का लिखा आलेख ‘अपने अपने रामविलास’ समकालीन जनमत के पाठकों के लिए यहाँ दिया जा रहा है. यह लेख डेढ़ दशक पहले तब लिखा गया था जब रामविलास जी की मृत्यु के बाद उनपर हमले किए जा रहे थे और उनकी विरासत को लेकर तमाम तरह के भ्रम फैलाए जा रहे थे. यह लेख उन हमलों और फैलाए गए भ्रमों  का जवाब है, जो आज भी प्रासंगिक है. (आलोचना के रामविलास अंक पर अविनाश कुमार, आशुतोष कुमार, रमेश कुमार,…

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ज़माना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है…

मंटो की लगभग प्रत्येक कहानी दारूण यथार्थ से आंख मिलाने का साहस रखती है। ऐसी गूँज पैदा करती है कि वह मानवता के पक्ष में जाए। यथार्थ की दारूणता का पीछा करते हुए मंटो कहीं भी मौका नहीं देते कि दारूणता को छिपा लिया जाय। लेकिन यह भी सच है कि यथार्थ का रूप सामने रखकर वह उसके सामने समर्पण नहीं कर देते। यह संदेश देते हैं कि दारूणता का प्रतिकार भी हो सकता है।

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