अल्पना मिश्र की कहानी : स्याही में सुर्खाब के पंख

जनतंत्र में ‘जन’ को नकार कर या पूरी तरह नियंत्रित मान लेना सही आकलन नहीं होगा, क्योंकि ‘जन ‘ में अभी भी असहमति का साहस बचा हुआ है और पूंजी, धर्म और सत्ता के गठजोड़ पर टिकी बर्बरता की पहचान से उपजे प्रतिरोध की आवाजें मुखर हैं

Read More