कामरेड शाह चाँद की याद

जाने कितनी यादे हैं कामरेड शाह चाँद की। आईपीएफ और फिर इंकलाबी मुस्लिम कान्फ्रेंस में साथ काम करने की। कामरेड तकी रहीम से नोक-झोंक फिर हंसी-मज़ाक की। उस पहले दिन की भी जब भदासी कांड हुआ। जनसंस्कृति मंच का विद्यापति भवन में सम्मेलन चल रहा था और अल-सुबह भदासी में घट रही घटना की खबर आई। उसी दिन वहाँ के ग्राम-प्रधान के रूप में उनका नाम पहली बार सुना। ग्राम-प्रधान के रूप में उन्हें आदर्श ग्राम प्रधान का खिताब सरकार ने दिया था। लेकिन सरकार को नहीं मालूम था कि…

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‘ आज की कविताएं आत्मचेतस व्यक्ति की प्रतिक्रिया है ’

अनिमेष फाउंडेशन लखनऊ की ओर से फ्लाइंग ऑफिसर अनिमेष श्रीवास्तव की स्मृति में ‘आज की कविता के स्वर’ एवम कविता पाठ का आयोजन किया गया. अनुराग पुस्तकालय लखनऊ में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हरी चरण प्रकाश ने की. उन्होंने अपने वक्तव्य में कविता के समय संदर्भों को व्याख्यायित किया और कहा की कविता गतिमान रहती है जो समय के साथ बदलती रहती है.युवा कवि एवं आलोचक अनिल त्रिपाठी ने ‘आज की कविता के स्वर’ पर अपने विचार रखते हुए मुक्तिबोध का हवाला देते हुए कहा कि आज की कविता आत्मचेतस व्यक्ति की प्रतिक्रिया है.

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वीरेन डंगवाल की याद और सृजन, कल्पना, रंगों, शब्दों और चित्रों की दुनिया

डॉ. कामिनी त्रिपाठी शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय बैकुंठपुर में आयोजित त्रिदिवसीय ‘वीरेन डंगवाल जन्म दिन समारोह’ का समापन 8 अगस्त को छात्राओं द्वारा वीरेन दा की कविताओं का पोस्टर बनाते हुए सम्पन्न हुआ | कार्यक्रम के पहले दिन लगभग 30 छात्राओं ने ‘नवारुण’ द्वारा प्रकाशित वीरेन दा की संपूर्ण कविताओं के संग्रह ‘कविता वीरेन’ से अपनी पसंद की कविताओं का चयन कर अपने अंदाज़ में उनका पाठ किया | छात्राओं द्वारा चयनित कविताओं को देखने से एक बात बहुत आसानी से समझी जा सकती है कि वीरेन दा की कविताएं…

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कवि वीरेन डंगवाल के 71वें जन्मदिन पर बरस रही थी कवि की याद

(पांच अगस्त को हिंदी के कवि वीरेन डंगवाल का जन्म दिन होता है । देश भर में कवि की याद में हुए आयोजनों में से कुछ झलकियाँ यहां प्रस्तुत हैं ।) बरस रही थी कवि की याद  कल पांच अगस्त को कवि वीरेन डंगवाल का जन्मदिन था .कवि तो बहुत हैं और उनकी यादें भी ,परन्तु मैंने लोगों को जिस तरह वीरेन डंगवाल को याद करते हुए सुना है ,देखा है वैसा किसी को नहीं .जो उनसे एक बार भी मिला है ,जो उनसे लोगों को मिलते हुए देखा भर…

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वीरेन दा की याद: ‘नदी’ कविता के बहाने से

शिव प्रकाश त्रिपाठी “ लंबे और सुरीले नहीं थे मेरे गान मेरी सांसे छोटी थी पर जब भी गाए मैंने बसंत के ही गान गाए अपनी फटी हुई छाती के बावजूद” बसंत आ चुका है पर न तो हवा में रवानगी ही आई और न फूलों में भौरें. फूल खिले तो हैं पर उनमें कालिख की एक पूरी परत चढ़ी हुई है. ये अंधकार युग की पदचाप भी हो सकती है. एक ऐसा समय गति में है, जहाँ एक तरफ पूरे विश्व में वैश्वीकरण बनाम संरक्षणवाद पर छाती-पीट बहस चल…

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कबीर और नागार्जुन की जयंती से जन एकता सांस्कृतिक यात्रा आरम्भ

बेगूसराय. आज ज्येष्ठ पूर्णिमा दिनांक 28/06/2018 को जन संस्कृति मंच की ओर से कबीर और आधुनिक कबीर नागार्जुन की सम्मिलित जयंती मनायी गयी। इस जयंती के अवसर पर जसम ने जन एकता सांस्कृतिक यात्रा का आयोजन किया, जो वर्तमान व्यवस्था में पल रहे फासीवादी तत्त्व के खिलाफ जन-जागृति का अभियान था। जन एकता सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत बेगूसराय से हुई, जहां नागार्जुन जी की छोटी बेटी मंजू देवी तथा दामाद अग्निशेखर जी ने झंडी दिखाकर जत्था को विदा किया। इस प्रथम जत्थे का नेतृत्व जसम के राज्य उपाध्यक्ष दीपक सिन्हा…

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खैनी खिलाओ न यार! /उर्फ / मौत से चुहल (सखा, सहचर, सहकर्मी, कामरेड महेश्वर की एक याद)

अपने प्रियतर लोगों- कृष्णप्रताप (के.पी.), गोरख, कामरेड विनोद मिश्र, महेश्वर पर चाहते हुए भी आज तक कुछ नहीं लिख सका। पता नहीं क्यों? इसकी वज़ह शायद उनसे एक जरूरी दूरी नहीं बन पाई आज तक, ताकि उसे देख सकूँ। शायद वे सब लोग स्मृतियों में आज भी वैसे ही साथ रहते-चलते चल रहे हों जैसे तब। शायद यह भी कि ये चारों लोग मिल कर स्मृति का एक वृत्त बन जाते हैं, इस तरह कि अलगा कर इनमें से किसी एक पर नहीं लिखा जा सकता। आज महेश्वर की पुण्य-तिथि…

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मेरी स्वतंत्रता किसके पास है

राजकिशोर एक प्रखर आधुनिक चिंतक थे. मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता का अधिकार उनका सबसे प्यारा सरोकार था. स्वतंत्रता की उनकी अवधारणा व्यापक और मूलगामी थी. प्रस्तुत निबंध उनके इस सरोकार को सबसे खूबसूरत तरीके से उजागर करता है.

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साक्षी मिताक्षरा की कविताएं : गाँव के माध्यम से देश की राजनीतिक समीक्षा

आर. चेतन क्रांति गाँव हिंदी कविता का सामान्यतः एक सुरम्य स्मृति लोक रहा है, एक स्थायी नोस्टेल्जिया, जहाँ उसने अक्सर शहर में रहते-खाते-पीते, पलते-बढ़ते लेकिन किसी एक बिंदु पर शहर के सामने निरस्त्र होते समय शरण ली है. वह गाँव जो छूट गया, वह गाँव जिसे छोड़ना पड़ा, वह गाँव जहाँ सब कुछ बचपन की तरह इतना सुंदर था, अक्सर कविता में आता रहा है. गद्य विधाओं में गाँव जिस तरह देश की राजनीतिक समीक्षा का आधार बना, वैसा कविता में संभवतः नहीं हुआ. इधर के नए कवियों में शहर…

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यहीं कही रहेंगे केदारनाथ सिंह

मंगलेश डबराल, वरिष्ठ कवि हिन्दी कविता की एक महत्वपूर्ण पीढी तेज़ी से विदा हो रही है. यह दृश्य  दुखद और  डरावना  है जहां ऐसे बहुत कम कवि बचे हैं जिनसे कविता का विवेक और प्रकाश  पाया जा सके. पिछले वर्ष कुंवर नारायण, चंद्रकांत देवताले, दूधनाथ सिंह, और अब केदारनाथ सिंह. केदार जी रक्तचाप, मधुमेह या हृदयाघात जैसी व्याधियों  से मुक्त थे जो अस्सी वर्ष पार करने वाले व्यक्ति को प्रायः अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं और सब को उम्मीद थी कि वे निमोनिया पर काबू पाकर फिर से लेखन…

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अलविदा, स्टार गुरु जी !

  मैंने 1989 के जुलाई महीने में जे एन यू के भारतीय भाषा विभाग के हिंदी विषय में एडमिशन लिया. कोर्स एम ए का था. इससे पहले मैं इलाहाबाद में गधा पचीसी के 23 साल बिता चुका था पूरब के तथाकथित ऑक्सफ़ोर्ड से काफ़ी अच्छी तरह से ऊब चुका था. जे एन यू के हिंदी विभाग में एडमिशन के लिए कोशिश का बड़ा आकर्षण नामवर जी, केदार नाथ सिंह और मैनेजर पाण्डेय थे जो न सिर्फ़ भारतीय भाषा केंद्र के आकर्षण थे बल्कि समाज विज्ञान, इतिहास और विज्ञान के छात्र…

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उठो कि बुनने का समय हो रहा है

केदारनाथ सिंह की कुछ कवितायेँ   मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिला मैं लिखने बैठ गया हूँ मैं लिखना चाहता हूँ ‘पेड़’ यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है मैं लिखना चाहता हूँ ‘पानी’ ‘आदमी’ ‘आदमी’ – मैं लिखना चाहता हूँ एक बच्चे का हाथ एक स्त्री का चेहरा मैं पूरी ताकत के साथ शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका जो शब्द और आदमी की टक्कर से…

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सुशील सिद्धार्थ के अन्दर सृजन की बहती नदी थी जिसे बाहर आना बाकी था

कौशल किशोर   सुशील सिद्धार्थ का जाना दुखद, बेहद दुखद। अविश्वसनीय सा, सदमे से भरा। हम सभी स्तब्ध हैं इसलिए कि यह कोई जाने की उम्र नहीं थी। वे साहित्य के मार्चे पर बड़ी मजबूती से डटे थे। उनका जन्म 2 जुलाई 1958 को सीतापुर, उत्तर प्रदेश के एक  गांव में हुआ। साहित्य यात्रा का आरम्भ उन्होंने छात्र जीवन से किया। लखनऊ विश्वविद्यालय से अपने मित्रों के साथ मिलकर एक पत्रिका की शुरुआत की। यह अस्सी का दशक रहा होगा। कई विधाओं में उन्होंने सृजन किया। कविताएं, आलोचना, व्यंग्य, संपादन…

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लेखक-पत्रकार अनिल सिन्हा का व्यक्तित्व अनुकरणीय : सीबी सिंह

  अनिल सिन्हा की सातवीं पुण्यतिथि पर जन संस्कृति मंच ने लखनऊ में आयोजित किया कार्यक्रम लखनऊ.  जाने-माने पत्रकार अनिल सिन्हा जनवादी और प्रगतिशील व्यक्तित्व के रचनाकार रहे हैं। उन्होंने अपने को डी क्लास करते हुए जिस तरह सहज-सरल व्यक्ति के रूप में अपने को ढ़ाला वह सबके लिए अनुकरणीय है। यह बात वामपंथी चिन्तक सी बी सिंह ने 25 फरवरी को अनिल सिन्हा की सातवीं पुण्यतिथि पर जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कही। कार्यक्रम दो सत्रों में बंटा था। पहला सत्र अनिल सिन्हा के…

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अनिल सिन्हा : बाहर से शान्त, भीतर धधकती आग

 ( क्रांतिकारी वाम राजनीति और संस्कृति -कर्म के अथक योद्धा एवं जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य अनिल सिन्हा की आज पुण्य तिथि है. उनके साथी और जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर का मार्च 2011 में लिखा यह लेख उनके जीवन और व्यक्तित्व को हमारे सामने प्रस्तुत करता है )   हमने ऐसा सोचा भी नहीं था कि हमारे अत्यन्त प्रिय साथी अनिल सिन्हा इतना जल्दी हमारा साथ छोड़ देंगे। 2011 की पहली तारीख को हमने उन्हें दिल्ली के लिए विदा किया था। एक दिन…

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