भुलाए नहीं भूलेगा यह दिन

कमरे में चौकी पर बैठे थे नागार्जुन. पीठ के पीछे खुली खिड़की से जाड़े की गुनगुनी धूप आ रही थी. बाहर गौरैया चहचहा रही थी. तभी पहुंचे कॉ. विनोद मिश्र, कवि से मिलने कवि के पास. समय ठिठका-सा रहा, शब्द चूक-से गए. नागार्जुन ने वीएम के चेहरे को कांपती उंगलियों से टटोला. देर तक नाक, कान, ठुड्डी को छूते रहे। उनकी भाव विह्वल आंखें चमक से भर गईं.

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