जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी विष्णु खरे की याद

अशोक पाण्डे अलविदा विष्णु खरे – 1 जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी उस आदमी की महाप्रतिभा का हर कोई कायल रहा. असाधारण उपलब्धियों और आत्मगौरव से उपजे उनके नैसर्गिक दंभ का भी मैं दीवाना था. उनका दंभ उन पर फबता था. ऐसा कोई दूसरा आदमी अभी मिलना बाकी है जिसके बारे में ऐसा कह सकूं. उनके अद्वितीय जीवन का विस्तार इतना विराट था कि भले-भलों की कल्पना तक वहां नहीं पहुँच सकती. बौनों से भरे साहित्य-संसार दुनिया में वे…

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मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़, ये के सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा

मीना कुमारी (1 अगस्त, 1933 – 31 मार्च, 1972) का असली नाम महजबीं बानो था , इनका जन्म मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. वर्ष 1939 से 1972 तक इन्होंने फ़िल्मी पर्दे पर काम किया. मीना कुमारी अपने दौर की एक बेहतरीन अदाकारा होने के साथ-साथ शायरा और पार्श्वगायिका भी थीं. आइए इनकी 85 वीं सालगिरह पर भारतीय सिने जगत की इस महान अदाकारा को उनकी कुछ चर्चित ग़ज़लों की मार्फ़त याद करें. मीना कुमारी की ग़ज़लें- चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा, दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा…

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लस्ट स्टोरीज : अपनी राह तलाशती स्त्रियाँ

‘लस्ट स्टोरीज’ पिछले तीन दशकों में हुए सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक गहमागहमी से बनती गई नयी स्त्री और उसके पुरुष के साथ संबंधों को एक्सप्लोर करती है. यह स्त्री जो अलग-अलग तबकों से आती है लेकिन वह अपनी पूरी शारीरिकता के साथ मौजूद है और उसमें कोई और तरह का गिल्ट हो सकता है लेकिन अपनी शारीरिकता को लेकर आई सहजता के मामले में उसे कोई गिल्ट नहीं है.

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काला : फ़ासीवाद की पहचान कराती फ़िल्म

सुपरस्टार रजनीकांत की जानी पहचानी शैली की फ़िल्म होते हुए भी महज एक कल्ट फ़िल्म नहीं है. यह देश के वर्तमान राजनीतिक माहौल का नाटकीय रूपक बनने की भरपूर कोशिश करती है और इसमें दूर तक सफल भी होती है.

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बॉलीवुड के स्टीरियोटाइप को तोड़ती ‘ राज़ी ’

एक ऐसे दौर में जब राष्ट्रवाद की नयी परिभाषायें गढ़ी जा रही हों और देशभक्ति पर एकाधिकार जताया जा रहा हो तो ‘राज़ी’ रुपहले परदे पर बहुत ही सशक्त तरीके से यह बताने में कामयाब होती है कि राष्ट्रवाद इकहरा नहीं हो सकता और देशभक्ति होने के लिये किसी एक मजहब का होना जरूरी नहीं है.

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राज़ी : नागरिकता और मनुष्यता का अन्तर्द्वन्द्

नेशन फर्स्ट भूमण्डलित दुनिया का नया फैशन है। अमरीका से लेकर रूस तक इसी नारे पर चुनाव जीते जा रहे हैं। भारत में भी इन दिनों इसी का बोलबाला है। यह एक नई नैतिकता है जिसे हर तरह की नैतिकता के ऊपर बिठा दिया गया है। इस सुपर नैतिकता के पीछे भी एक डर है- देश के टूट जाने का डर। ये डर ही सभी पूर्वग्रहों, नफरतों और पागलपन की जड़ है।

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