ज्ञान और विचार का केंद्र शिब्ली अकादमी

दुर्गा सिंह शिब्ली मंजिल या शिब्ली अकादमी या दारुलमुसन्निफ़ीन (हॉउस ऑफ़ राइटर या लेखकों का अपना घर) आज़मगढ़ में स्थित ऐसी जगह है, जिससे कोई भी स्कॉलर अचंभित हुए बिना नहीं रहेगा. इसकी परिकल्पना अल्लामा शिब्ली नोमानी ने की थी. इसके लिए उन्होंने अपना बंगला और एक आम का बाग़ दिया. अपने परिवारीजनों से ज़मीन मांगी. भोपाल और हैदराबाद रियासत से मदद मांगी. बेगम भोपाल ने पैसों से मदद की. इसके अलावा उन्होंने अपने शागिर्दों को इसमें इन्वाल्व किया. जो लोग ऐसी हैसियत में थे उनसे ताल्लुक रखने वाले सबको…

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नेताजी बोस, नेहरू और उपनिवेश विरोधी संघर्ष

यदि आधुनिक भारत एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र है तो उसमें देश में चले उपनिवेश विरोधी संघर्ष का प्रमुख योगदान है। विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं वाले लोग इस संघर्ष में शामिल हुए और सभी ने अपने-अपने तरीके से भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के इस अभियान में योगदान दिया। लेकिन कुछ ऐसे लोग, जो धर्म को ही राष्ट्र का आधार मानते थे, इसमें शामिल नहीं हुए और आज वे चुनाव जीतने के लिए या तो इसमें भाग लेने के झूठे दावे करते हैं या स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं, विशेषकर नेहरू,…

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कोरस के सालाना कार्यक्रम ‘अजदिया भावेले’ में रजिया सज्जाद ज़हीर की कहानियों का पाठ एवं मंचन

28 अक्टूबर, पटना आज कोरस के सालाना कार्यक्रम ‘अजदिया भावेले’ की शृंखला में इस बार साहित्यकार, नाट्यकर्मी व एक्टिविस्ट रज़िया सज़्ज़ाद ज़हीर के जन्म-शती वर्ष पर उनकी कहानियों का पाठ एवं मंचन का आयोजन किया गया। भारतीय उपमहाद्वीप में प्रगतिशील धारा के साहित्य पर कोई भी बातचीत रज़िया सज्जाद ज़हीर के बिना मुक़म्मल नहीं होगी।उनकी कहानियां अविभाजित भारत के साम्राज्यवाद-विरोधी व साम्प्रदायिकता-विरोधी मूल्यों को बढ़ानेवाली व आम जन के मार्मिक व संवेदनशील संदर्भ की हैं ।उनकी कहानियों में देश के विभाजन का दर्द मुखर होकर सामने आता है। कार्यक्रम की…

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अपने-अपने रामविलास: प्रणय कृष्ण

आज रामविलास जी का जन्मदिन पड़ता है.  इस अवसर पर प्रणय कृष्ण का लिखा आलेख ‘अपने अपने रामविलास’ समकालीन जनमत के पाठकों के लिए यहाँ दिया जा रहा है. यह लेख डेढ़ दशक पहले तब लिखा गया था जब रामविलास जी की मृत्यु के बाद उनपर हमले किए जा रहे थे और उनकी विरासत को लेकर तमाम तरह के भ्रम फैलाए जा रहे थे. यह लेख उन हमलों और फैलाए गए भ्रमों  का जवाब है, जो आज भी प्रासंगिक है. (आलोचना के रामविलास अंक पर अविनाश कुमार, आशुतोष कुमार, रमेश कुमार,…

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क्यों डरती रही हैं भारत की सरकारें 1857 से

1857 ने जिस राष्ट्रवाद का आगाज किया था, उसकी विरोधी शक्तियां आजाद भारत में सत्ता के शिखर पर पहुंच चुकी हैं. यानी पहली जंग-ए-आजादी ने नया हिंदुस्तान बनाने की जो चुनौतियां हमारे सामने उपस्थित की थीं, जो लक्ष्य निर्धारित किये थे, जो सपने देखे थे, वे आज न सिर्फ अधूरे हैं, बल्कि सबसे बड़ी बाधा का सामना कर रहे हैं.

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