हेमन्त कुमार की कहानी ‘ रज्जब अली ’ में सामंती वैभव देखना प्रतिक्रियावाद को मजबूत करना है

कहानी में मूल समस्या साम्प्रदायिकता है. यह कहानी हमारे समय के लिहाज से एक बेहद जरूरी कहानी है. इसलिए जरूरी यह है कि इस कहानी के मूल मन्तव्य पर बात हो. कहानी के मूल मन्तव्य पर बात न करके हम उन्ही प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ मजबूत करते दिखेंगे.

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सामंती वैभव के प्रति नॉस्टेल्जिया से ग्रस्त है कहानी ‘ रज्जब अली ’

‘ रज्जब अली ’ कहानी में कथाकार बड़ा आख्यान रचने की कोशिश में कई ऐसी गलतियाँ कर बैठे हैं जिसकी वजह से अपने बड़े उद्देश्य के बावजूद इसकी विश्वसनीयता सन्देह के घेरे में आ जाती है. सबसे पहली बात यह कि आज के भारत का फासीवाद निश्चित तौर पर मुसलमानों और दलितों के दमन के जरिये आगे बढ़ रहा है लेकिन आज के दमन का रूप वह नहीं है जो प्रेमचंद के जमाने मे था या आज से चार-पांच दशक पहले तक था. आज दलित पीड़ित हैं लेकिन मजलूम नहीं हैं.

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