प्रेमचंद का यह जो ‘हिन्दू पाठ’ है

प्रेमचंद को गलत ढ़ंग से प्रस्तुत कर संघ परिवार अपने पक्ष में हिन्दी मानस को निर्मित करने में लगा है। यह हमला एक साथ प्रेमचंद और पाठकों के मानस पर हमला है। प्रेमचंद के सामने हमेशा ‘समानता का ऊँचा लक्ष्य’ था। उन्होंने यह साफ लिखा है कि ‘धर्म और नीति का दामन पकड़ कर वहां उस लक्ष्य तक नहीं पहुंचा जा सकता’। वे पूंजीवादी सभ्यता – ‘महाजनी सभ्यता’ के विरोधी थे। प्रेमचंद के प्राचीन अध्येता गोयनका ‘महाजनी सभ्यता’ द्वारा व्यक्त आक्रोश को ‘सामाजिक’ न मानकर ‘व्यक्तिगत’ मानते थे। सवाल करते हैं ‘रहस्य’ कहानी ‘महाजनी सभ्यता’ से कहां मिलती है ?

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