अंतःकरण और मुक्तिबोध के बहाने

(मुक्तिबोध के जन्मदिन पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय का आलेख) 2017 में मुक्तिबोध की जन्मशताब्दी गुज़री है और 2018 मार्क्स के जन्म की द्विशाताब्दी है। मुक्तिबोध की रचना और विश्वदृष्टि का मार्क्स की विश्वदृष्टि से गहरा नाता है। यह जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि मार्क्स को गुज़रे 200 वर्ष हो गए, दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई, वे अब पुराने पड़ गए। अब मार्क्सवाद प्रासंगिक नहीं रहा। भारत में तो सत्तारूढ़ दल उन्हें यह कह कर भी नकार रहे हैं कि मार्क्स विदेशी थे…

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अपने-अपने रामविलास: प्रणय कृष्ण

आज रामविलास जी का जन्मदिन पड़ता है.  इस अवसर पर प्रणय कृष्ण का लिखा आलेख ‘अपने अपने रामविलास’ समकालीन जनमत के पाठकों के लिए यहाँ दिया जा रहा है. यह लेख डेढ़ दशक पहले तब लिखा गया था जब रामविलास जी की मृत्यु के बाद उनपर हमले किए जा रहे थे और उनकी विरासत को लेकर तमाम तरह के भ्रम फैलाए जा रहे थे. यह लेख उन हमलों और फैलाए गए भ्रमों  का जवाब है, जो आज भी प्रासंगिक है. (आलोचना के रामविलास अंक पर अविनाश कुमार, आशुतोष कुमार, रमेश कुमार,…

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