प्रेम के बहाने एक अलग तरह का सामाजिक विमर्श रचती पल्लवी त्रिवेदी की कविताएँ

निरंजन श्रोत्रिय   युवा कवयित्री पल्लवी त्रिवेदी की कविताओं को महज़ ‘प्रेम कविताएँ’ या रागात्मकता की कविताएँ कहने में मुझे ऐतराज़ है। पल्लवी की विलक्षण काव्य-प्रतिभा प्रेम के बहाने एक अलग तरह का सामाजिक विमर्श रचती हैं जिसमें स्त्री-विमर्श, पुरूष का अहं, रिश्तों की संरचना और मनोभावों के उदात्त स्वरूप सभी कुछ सम्मिलित हैं। प्रेम को परिभाषित करना वैसे भी दुष्कर है। उसे अनिर्वचनीय कहा गया है। वह ‘मूकास्वादनवत्’ एवं ‘सूक्ष्मतरमनुभव स्वरूपम्’ है। प्रेम की प्रक्रिया का विकास स्थूल से सूक्ष्म और व्यष्टि से समष्टि की ओर होता है। युवा…

Read More

नित्यानंद गायेन की कविताओं में प्रेम अपनी सच्ची ज़िद के साथ अभिव्यक्त होता है

कुमार मुकुल   नित्यानंद जब मिलते हैं तो लगातार बोलते हैं, तब मुझे अपने पुराने दिन याद आते हैं। कवियों की बातें , ‘कांट का भी दिमाग’ खा डालने वालीं। नित्यानंद की कविताएँ रोमान से भरी होकर भी राजनीतिक विवेक को दर्शाती हैं। एक बार बातचीत में आलोकधन्वा ने कहा था – लोग नहीं जानते,रोमान्टिक होना कितना कठिन है, रोमांटिसिज्म के बिना कोई बड़ा कवि नहीं हो सकता। नित्यानंद लिखते हैं – अरे बुद्धु, कवि मरते नहीं मार दिए जाते हैं अक्सर कभी प्रेम के छल से कभी सत्ता के…

Read More

अपने समय की आहट को कविता में व्यक्त करता कवि विवेक निराला

युवा कवि विवेक निराला की इन कविताओं को पढ़ कर लगता है मानो कविता उनके लिए एक संस्कार की तरह है-एकदम नैसर्गिक और स्वस्फूर्त! इन कविताओं में एक निर्झर-सा प्रवाह है-एक-एक शब्द, संवेदनों और शिल्प में कल-कल की ध्वनि-सा! उनकी कविता एक यत्नहीन कविता-सी है, सायास या प्रविधि जैसा कुछ भी नहीं। इस युवा कवि में अपने समय की आहट सुनने का गजब का माद्दा है। अपने समय की तमाम विसंगतियों और विद्रूपताओं को वे बहुत हौले-से, बगैर किसी काव्य-उत्तेजना के अपनी कविता में उतारते हैं। बगैर किसी आहट के…

Read More

रेतीले टिब्बों पर खड़े होकर काले बादलों की उम्मीद ओढ़ता कवि : अमित ओहलाण

कविता जब खुद आगे बढ़कर कवि का परिचय देने में सक्षम हो तो फिर उस कवि के लिए किसी परिचय की प्रस्तावना गढ़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती. कविता की पहली पंक्ति ही यह पता दे कि कवि उस ज़मीन में जीवन रोप रहा है जहाँ उसने किसान की सहज बुद्धि और श्रम के साथ मौसम की भंगिमाओं को जाना है, वह जानता है कि बीजों की गुणवत्ता के साथ-साथ, पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे के बीच कितनी दूरी रखी जानी चाहिए, उसे ज्ञान है कि किन फसलों की बुआई…

Read More

युवा कविता की एक सजग, सक्रिय और संवेदनशील बानगी है निशांत की कविताएँ

जब भी कोई नई पीढ़ी कविता में आती है तो उसके समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न होता है कि वह अपने से ठीक पहले की पीढ़ी की कविताओं को किस तरह पढ़े. इस पढ़ने में उसकी अपनी अनुपस्थिति जरुरी है या उपस्थिति. कवि का पढ़ना उसका लिखना भी होता है. इस कठिन-कविता के दौर में निशांत ने न सिर्फ अपना अलग मुकाम बनाया है, बल्कि अपने से पहले की पीढ़ी की कविता को पढ़ने का ढब भी विकसित किया है. बेरोजगारी, प्रेम, अकेलापन, संघर्ष और यारबासी- ये कुछ ऐसे विषय है जिससे हर युवा…

Read More

चार आयामों का एक कवि विष्णु खरे

मंगलेश डबराल   यह बात आम तौर पर मुहावरे में कही जाती है कि अमुक व्यक्ति के न रहने से जो अभाव पैदा हुआ है उसे कभी भरा नहीं जा सकेगा. लेकिन विष्णु खरे के बारे में यह एक दुखद सच्चाई है की उनके निधन से जो जगह खाली हुई है, वह हमेशा खाली रहेगी. इसलिए की विष्णु खरे मनुष्य और कवि दोनों रूपों में सबसे अलग, असाधारण और नयी लीक पर चलने वाले व्यक्ति थे. वे कवि,आलोचक, अनुवादक, शास्त्रीय और फिल्म संगीत के गहरे जानकार, सिमेमा के मर्मज्ञ और पत्रकार…

Read More

समय के जटिल मुहावरे को बाँचती घनश्याम कुमार देवांश की कविताएँ

आज के युवा बेहद जटिल समय में साँस ले रहा है. पूर्ववर्ती पीढ़ी में मौजूद कई नायाब और सौंधे सुख उसकी पीढ़ी तक पहुँचने से पहले ही नदारद हो चुके हैं. इसलिए वह उन अनुभूतियों के बीच से गुज़र कर जीवन का आनंद नहीं उठा सकता जिसमें उनके पूर्ववर्तियों ने सांस ली है वह बस अपने बुजुर्गों के ज़रिये उन नदारद हो चुकी अनुभूतियों को पढ़-सुन सकता है. यही युवा शिक्षा अर्जित करने के बाद जब नौकरी की तलाश करता है तब उसे जीवन की कड़वी सच्चाईयों का सामना करना पड़ता…

Read More

पूनम वासम की कविताएँ सजग ऐंद्रिय बोध और वस्तु-पर्यवेक्षण की कविताएँ हैं

हिन्दी कविता में आदिवासी जमीन से आने वाली पहली कवयित्री सुशीला सामद हैं। उनका संग्रह “प्रलाप” नाम से 1935 में, सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा के संग्रहों के लगभग साथ ही छपा था। उस समय उनकी स्वीकार्यता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि उनके इस पहले ही संग्रह की भूमिका सरस्वती पत्रिका के ख्यात संपादक देवीदत्त शुक्ल ने लिखी। उस छोटी-सी भूमिका में वे दो महत्त्वपूर्ण सूत्र प्रस्तावित करते हैं, जिनपर पुनर्विचार की ज़रूरत है। वे लिखते हैं कि “प्रलाप नामधारी इस करूण-रस-पूर्ण ‘अंतर्लाप’ को पढ़कर…

Read More

वीरेन दा की याद: ‘नदी’ कविता के बहाने से

शिव प्रकाश त्रिपाठी “ लंबे और सुरीले नहीं थे मेरे गान मेरी सांसे छोटी थी पर जब भी गाए मैंने बसंत के ही गान गाए अपनी फटी हुई छाती के बावजूद” बसंत आ चुका है पर न तो हवा में रवानगी ही आई और न फूलों में भौरें. फूल खिले तो हैं पर उनमें कालिख की एक पूरी परत चढ़ी हुई है. ये अंधकार युग की पदचाप भी हो सकती है. एक ऐसा समय गति में है, जहाँ एक तरफ पूरे विश्व में वैश्वीकरण बनाम संरक्षणवाद पर छाती-पीट बहस चल…

Read More

अमरेंद्र की अवधी कविताएँ: लोकभाषा में संभव राजनीतिक और समसामयिक अभिव्यक्तियाँ

( कवि-कथन : अवधी में कविता क्यों ? मुझसे मुखातिब शायद यही, किसी का भी, पहला सवाल हो। जवाब में कई बातें हैं लेकिन पहला कारण यही है कि जैसी सहजता मैं अपनी मातृभाषा अवधी में पाता हूँ वैसी कहीं दूसरी जगह नहीं। यह सहजता ‘प्रथम भाषा’ होने की सहजता है। यह सहजता वैसे ही है जैसे घर-गाँव में किसी रहवासू की होती है। नागर व औपचारिक जीवन के बरअक्स। सभ्यता के बहुत से भाषायी आवरण भी होते हैं जिनकी लपेट में भाषा अक्सर बँध जाती है। भाषायी मानकीकरण भी…

Read More

सभ्यता का परदा हटातीं हैं आर. चेतन क्रांति की कवितायेँ

2004 में आए अपने पहले कविता  संग्रह ‘शोकनाच’ के साथ आर चेतन क्रांति ने इक्कीसवीं सदी की दुनिया के पेच शायद सबसे करीने से पकड़े। इक्कीसवीं सदी में जीने की कुंजी प्रबंधन है- सबकुछ प्रबंधित-प्रायोजित-परिभाषित है- प्रकृति हो या मनुष्य, उसकी उत्पादकता को प्रबंधन के दायरे में लाना, उसे उपयोगी बनाना इकलौता लक्ष्य है। जो इस लक्ष्य से बाहर है, इसे अस्वीकार करता है, वह विफल है, पीछे छूट जाने को अभिशप्त है। सत्ता राजनीति की हो या कविता की- यह एकमात्र सच है। उस संग्रह की पहली ही कविता…

Read More

संजीव कौशल की कवितायेँ : प्रतिगामी विचारों का विश्वसनीय प्रतिपक्ष

जागृत राजनीतिक चेतना, समय और समाज की विडम्बनाओं की गहरी समझ और भाषा की कलात्मक पारदर्शिता के कारण संजीव कौशल की कवितायेँ नयी सदी की युवा पीढ़ी के बीच अपनी अलग पहचान बनाती हैं. कविता और अन्य सभी सृजनात्मक लेखन के लिए यह समय इस मायने में संकटपूर्ण है कि एक तरफ, धीरे धीरे हमारा समाज नवजागरण के मूल्यों को खोते हुए, प्रतिगामी विचारों से आक्रांत होकर सत्ता के उन्माद का शिकार होता जा रहा है, तो दूसरी तरफ हमारे कवि, लेखक, यानी मशालें लेकर चलनेवाले लोग ज्ञान मीमांसात्मक विभ्रम से ग्रस्त…

Read More

सहज काव्‍य‍कथाओं सी हैं अदनान की कविताएँ

अदनान की कविताओं से गुजरना अपने समय के लोक से गुज़रना और उसकी त्रासदियों को जानते हुए उसकी लाचारी को अपनी लाचारी में बदलते देखना है. ये सहज काव्‍य‍कथाओं सी हैं जिनमें काव्‍य में विमर्श की परंपरा आगे बढ़ती है.

Read More

कुमार मुकुल की कविताएँ : लोकतंत्र के भगवाकरण की समीक्षा

30 वर्षों से रचनारत कुमार मुकुल के कविता परिदृश्य का रेंज विशाल और वैविध्य से भरा है , प्रस्तुत कविताओं में आज के समय को कुमार मुकुल ने मूलतः लोकतंत्र के भगवाकरण की समीक्षा के बतौर सामने रखा है.

Read More

विहाग वैभव की कविताएँ : लोक जीवन के मार्मिक संवेदनात्मक ज्ञान की कविताएँ हैं- मंगलेश डबराल

  युवा कवि विहाग वैभव की कविताओं में क्रांति, विद्रोह, विरोध, निषेध के तीखे स्वर हैं और वह प्रेम भी है जिसे संभव करने के लिए क्रांतियाँ की जाती रही हैं. एक नवोदित और प्रतिबद्ध कवि से यही अपेक्षा की जाती है. लेकिन विहाग की संवेदना में लोक-स्मृति गहरे बसी हुई है और यह एक खूबी उन्हें अपने समकालीनों या शहराती कवियों से कुछ अलग पहचान देती है. यह लोक संवेदना भी भावुकता या रूमान से नहीं, बल्कि साधारण जनों के श्रम और संघर्ष से उत्पन्न हुई है. एक कविता…

Read More

अच्युतानंद मिश्र की कविताएँ : अपने जीवनानुभवों के साथ ईमानदार बर्ताव की कविताएँ हैं

विष्णु नागर अच्युतानंद मिश्र की छवि एक अच्छे कवि, गंभीर अध्येता और एक आलोचक की बनी है। इधर हमारी कविता में अनकहे की अनुपस्थिति बढ़ती जा रही है और सब कुछ कहने की विकलता बढ़ रही है।अच्युतानंद के बारे में मुझे एक उल्लेखनीय बात यह दीखती है कि उनकी कविता का बहुलांश अनकहे का स्पेस छोड़ता है। यह अनकहा ही उस मर्म को खोलता है, जिस तक ले जाना कवि का अभिप्रेत है। ऐसी उनकी बहुत सी छोटी -बड़ी कविताएं हैं,जिनमें यह स्पेस ज्यादा है। उदाहरण के लिए यह छोटी…

Read More

प्रदीप कुमार सिंह की कविताएँ : विह्वल करने से ज़्यादा विचार-विकल करती हैं

नदी समुद्र में जाकर गिरती है, यह तो सब जानते हैं. लेकिन यह सच्चाई तो प्रदीप की कविता को पता है कि नदी अपना दुःख दूसरी नदियों को सुनाने जाती है. क्योंकि स्त्री का दुःख स्त्री ही समझ सकती है. नदी जानती है कि समुद्र में उसका अस्तित्व खो जायेगा. इसलिए अपने होने का अर्थ एक नदी को दूसरी नदी ही बता सकती है.
लोकतंत्र के नाम पर जिस तंत्र का त्रास हमारे जन-सामान्य को झेलना पड़ रहा है, प्रदीप की निगाह उस पर भी रहती है. करुणा और व्यंग्य के मेल से ऐसी कविताएँ विह्वल करने से ज्यादा विचार-विकल करती हैं

Read More