जेल का भय रिश्ते का आधार नहीं, संवैधानिक नैतिकता से बनेगा लोकतांत्रिक समाज

अगर हमारे कानून सामाजिक नैतिकता के आधार पर बनने लगे तो सोचिए कि हमारे समाज का क्या होगा ! क्योंकि सामाजिक नैतिकता तो अक्सर यही कहती है कि जाति के बाहर विवाह अनैतिक है, समलैंगिक रिश्ते रखना अनैतिक है, किसी लड़की का अपनी मर्जी के कपड़े पहनना अनैतिक है, किसी लड़की का अपने लिए बराबरी आज़ादी पाना अनैतिक है, किसी दलित लड़की या लड़के का किसी सवर्ण लड़के या लड़की से प्रेम संबंध अनैतिक है। सामाजिक नैतिकता तो पितृसत्तात्मक और जातिवादी नैतिकता है। और इसीलिए हम सामाजिक नैतिकता की बजाए संवैधानिक नैतिकता की ओर कदम बढ़ाते हैं तो हमारा समाज ज्यादा सुन्दर, ज्यादा लोकतांत्रिक बनेगा । इसकी हमें कोशिश करनी चाहिए।

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समलैंगिक और ट्रांस जेंडर लोगों के सम्मान और बराबरी के अधिकार पर हमला है सेक्शन 377

1917 के रूसी क्रांति के बाद रूस की क्रांतिकारी सरकार ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया. भारत में समलैंगिकता को अपराध बनाने वाले तो अंग्रेज़ ही थे. अंग्रेज़ चले गए पर अपना कानून छोड़ गए, जिसे भेदभावपूर्ण लोग ‘भारत की संस्कृति ‘ कहते हैं !

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