कबूतरी देवी को लोगों के बीच ले जाने की शुरुआत

नैनीताल के निचले हिस्से तल्लीताल में बाजार से ऊपर चढ़ते हुए एक रास्ता खूब सारे हरे-भरे पेड़ों वाले कैम्पस तक ख़तम होता है. यह कैम्पस राजकीय कन्या इंटरमीडिएट कालेज का है. इस कैम्पस में पिछले इतवार 16 सितम्बर 2018 को नैनीताल के सक्रिय संस्कृतिकर्मी ज़हूर आलम अपनी टीम के साथ कालेज के सभागार को सिनेमा हाल में बदलने की कसरत में जुटे थे. हाल की खिड़कियों में पल्ले मौजूद थे इसलिए अँधेरा हासिल करने के लिए ज्यादा मशक्कत न करनी पड़ी. दुपहर 3.30 से शो शुरू होना था लेकिन प्रोजक्शन…

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‘अपनी धुन में कबूतरी’ की पहली स्क्रीनिंग नैनीताल में

प्रीमियर शो दुपहर 3.30 जी जी आई सी, तल्लीताल, नैनीताल उत्तराखंड के पुराने लोगों के कानों में अब भी कबूतरी देवी के गाने गूंजते रहते। ‘पहाड़ो को ठंड पाणी…’ अब भी शीतलता प्रदान करता है। 1939 में उत्तराखंड के सुरम्य जनपद चंपावत के लेटी गाँव में जन्मी कबूतरी जी को यूं तो बचपन से ही संगीत के संस्कार मिले लेकिन शादी के बाद उनकी असल सांगीतिक यात्रा तब शुरू हुई जब उनके पति की भागदौड़ के कारण वे आखिरकार रेडियो की कलाकार बनीं। फिर तो सत्तर और अस्सी का दशक…

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फेंस के इधर -उधर और झुनू बहनजी का मोहल्ला छोड़ना

  ग़ाज़ियाबाद में हिंडन पार के जिस इलाके में पिछले 15 साल से रहता हूँ. वह लगभग 2 एकड़ में पांच ब्लाकों में बसा एक अपार्टमेंट है जिसमे ज्यादातर ख़बरनवीस रहते हैं . दो ब्लाक आठ मंज़िलों वाले हैं जिनमे लिफ्ट की सवारी करनी पड़ती है.तीन ब्लाक चार मंज़िले हैं जिनमें सीढ़ियाँ चढ़नी होती है. जब हम 2003 में यहाँ रहने आये तो 16 फ्लैट वाले हमारे बिना लिफ्ट वाले सी ब्लाक में कुछ जमा चार या पांच घर आबाद थे. पड़ोसी के नाम पर गिलहरी, कबूतरों या गमले में…

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