अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार एक रचनाकार की त्रासदी ‘मंटो’

अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ‘मंटो’ बायोपिक फिल्म की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था। समय-समय पर आने वाले ट्रेलर या वीडियो के टुकड़े इंतिजार को अ-धीरज में बदल रहे थे। आज वह दिन हाथ लग ही गया। कुछ रचनाकार होते हैं जिनके लेखन के साथ-साथ उनके जीवन का भी आकर्षण किसी को खींच सकता है। यह व्यक्तिगत रुचि का मसला हो सकता है। मेरे लिए तुलसी, कबीर, ग़ालिब, निराला, मंटो जैसे रचनाकार लेखन के साथ-साथ अपने जीवन का भी आकर्षण रखते हैं। उनके लेखन से गुजरने की तरह उनके जीवन…

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जनगीतों का सामाजिक सन्दर्भ

डॉ. राजेश मल्ल   साहित्य अपने अन्तिम निष्कर्षों में एक सामाजिक उत्पाद होता है। कत्र्ता के घोर उपेक्षा के बावजूद समय और समाज की सच्चाई उसके होठों पर आ ही जाती है। ऐसे में जब कविता का मूल भाव समाज परिवर्तन हो तो समाज में निहित द्वन्द्व, अन्तर्विरोध अत्यन्त स्वाभाविक रूप से कविता में घुल-मिलकर प्रवाहित होते हैं। ‘जनगीतों’ का स्वरूप कुछ ऐसे ही बना-रचा हुआ है। सामाजिक अन्तः सम्बन्ध और उनमें निहित असमानता के तनावपूर्ण रूप जनगीतों के मूल विषय हैं। जनगीतों में सर्वाधिक गैर बराबरी तथा शोषण और…

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मार्क्स का चिंतन सिर्फ आर्थिक नहीं सम्पूर्ण मनुष्यता का चिंतन है: रामजी राय

मार्क्स ने मुनष्य को एक समुच्चय में नहीं एक सम्पूर्ण इकाई के रूप में समझा और कहा कि वह एक ही समय में आर्थिक, राजनीतिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक होता है. उसे टुकड़ो-टुकड़ों में अलग-अलग नहीं देख सकते. मार्क्स का चिंतन सिर्फ आर्थिक चिंतन नहीं सम्पूर्ण मनुष्यता का चिंतन है.

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मरे हुए तालाब में लाशें नहीं विचारधाराएं तैर रही हैं

“जंगल केवल जंगल नहीं है नहीं है वह केवल दृश्य वह तो एक दर्शन है पक्षधर है वह सहजीविता का दुनिया भर की सत्ताओं का प्रतिपक्ष है वह ” अनुज लुगुन की लम्बी कविता ” बाघ और सुगना मुंडा की बेटी ” का एक अंश। यह चर्चित कविता हमारे समय के आदिवासी संघर्ष और सलवा जुडूम की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। बाघ के साथ आदिवासी का प्रेम और भय का एक जटिल रिश्ता रहा है। लेकिन मानव रूपी बाघों की बात अलग है।वे बाघ के संरक्षण की योजनाएं बनाते…

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मार्क्स और हमारा समय

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने नयी दिल्ली स्थित उर्दू घर में 19 मई के दिन ‘ मार्क्स और हमारा समय ’ शीर्षक से एक आम सभा का आयोजन किया. छात्रों, श्रमिकों, बुद्धिजीवियों और नागरिकों से खचाखच भरे सभागार को राजनीति विज्ञानी प्रो. अचिन विनायक, जानी मानी अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक, प्रसिद्ध पत्रकार उर्मिलेश तथा भाकपा ( माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने संबोधित किया.

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कार्ल मार्क्स : एक जीवन परिचय

दुनिया के मजदूरों के, सिद्धांत और कर्म दोनों मामलों में, सबसे बड़े नेता कार्ल मार्क्स (1818-1883) का जन्म 5 मई को त्रिएर नगर में हुआ जो प्रशिया के राइन प्रदेश में था । पिता पेशे से वकील थे, यहूदी थे लेकिन बाद में प्रोटेस्टेंट धर्म स्वीकार कर लिया था । त्रिएर नगर में प्रारंभिक शिक्षा जिम्नेजियम यानी विशिष्ट पाठशाला में हुई । जिम्नेजियम में ही उन्होंने पेशे के चुनाव पर विचार करते हुए एक लेख लिखा था जिससे आगामी जीवन की उनकी गतिविधियों का अनुमान होता है । इसमें उन्होंने…

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भारतीय समाज के बदलते वर्गीय एवं जातीय चरित्र को बारीकी से व्यक्त करने वाले कथाकार हैं मार्कण्डेय

मार्कंडेय ने भारतीय समाज के बदलते वर्गीय एवं जातीय चरित्र को बहुत ही बारीकी से अपनी कथाओं में व्यक्त किया है. सामाजिक ताने-बाने एवं राजनीतिक अर्थशास्त्र पर उनकी गहरी पकड़ रही जिसके कारण आदर्श कल्याणकारी लोकतान्त्रिक नीतियाँ हों या ग्रामीण जीवन, किसी के प्रति उनका रोमान एक स्तर से आगे नहीं बढ़ता. उनकी सचेत समाजशास्त्रीय दृष्टि उन्हें तुरंत यथार्थ की ज़मीन पर खींच लाते हैं.

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