मजदूरों को निचोड़ने और फेंकने का काल है यह

आज संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों में मजदूरों की दशा, अमानवीयता का सामना कर रही है। अपने देश में ज्यादातर मजदूर असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं और लचर श्रम कानून की सीमा से परे होते हैं । केवल 8-9 प्रतिशत मजदूर ही श्रम कानून के अंतर्गत आते हैं । फिर भी नीति नियंताओं की आंखों का पानी मर चुका है। विशेष दुर्दशा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की है जिनकी संख्या कुल मजदूरों का लगभग 92 प्रतिशत हैं । संगठित क्षेत्रों में महज 5 प्रतिशत मजदूर हैं। जिस शिकागो सम्मेलन के द्वारा काम के आठ घंटे निर्धारित करने की लम्बी लड़ाई मजदूरों ने लड़ी थी और जिसे आज भी मजदूर दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है, वह बेमानी हो चुका है । आज श्रमिकों से अठारह-अठारह घंटे काम लिया जा रहा है। बदले में किसी प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए समय नहीं दिया जा रहा ।

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कार्पोरेट के लिए गांवों तक लाल कारपेट बिछाने की नीति से हो रही है खेती-किसानी की तबाही

खेती-किसानी की नीतियों का वर्तमान स्वरूप किसान हितों के प्रतिकूल है। यह नीति खेती-किसानी की कब्र निर्माण के दूषित नीति के साथ पूरा होने को अभिशप्त जान पड़ता है। इसकी बुनियाद रातों-रात नहीं रखी गई है और न यह राष्ट्रीय नीतियों तक सीमित है। इसके पीछे कार्पोरेट से लेकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नीति और सत्ता का वर्ग चरित्र कार्य कर रहा है ।

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साम्प्रदायिक मनोवृत्ति से मुक्ति की तलाश

समाज में बढ़ते साम्प्रदायिक मनोवृत्ति को कैसे रोका जाये? कैसे नई पीढ़ी में भरी जा रही हिन्दू-मुस्लिम विभाजन, नफरत और भेद-भाव को कम किया जाये, इसी बिन्दु के इर्द-गिर्द शीरोज बतकही की 11वीं कड़ी में रविवार को चर्चा हुई।

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सत्ता पाने का औजार है साम्प्रदायिकता

लखनऊ में शीरोज बतकही की दसवीं कड़ी लखनऊ. हर रविवार आयोजित होने वाले शीरोज बतकही की दसवीं कड़ी में साम्प्रदायिक राजनीति के वर्तमान निहितार्थ पर बातचीत हुई. बातचीत की शुरुआत सामाजिक कार्यकर्ता दीपक कबीर ने की । उन्होंने कहा कि आइडेंटिटी पाॅलिटिक्स के नये उभार का रास्ता, साम्प्रदायिक उभार के रास्ते से संभव हो रही है। उन्होंने कहा कि पहले भी आइडेंटिटी पाॅलिटिक्स होती थी मगर तब वह सत्ता पाने का उपकरण नहीं होती थी। अब स्थिति बदल चुकी है। ब्रिटिश भारत में 1918-20 के आसपास, देश में साम्प्रदायिक संस्थाओं…

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लखनऊ में शीरोज बतकही की 9वीं कड़ी : न्याय का अधिनायकवाद बनाम जनविरोधी न्याय तंत्र

आज तीन करोड़ के लगभग मुकदमे विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं. हमारे जातिवादी समाज में दलितों और पिछड़ों की न्यायालयों में न के बराबर भागीदारी है. न केवल जजों की संख्या बल्कि योग्य वकीलों की संख्या में भी इन वर्गों का बहुत कम स्थान है. ऐसे में ऊंच-नीच और गैरबराबरी के इस समाज में, जहां निम्न समाज के लोग न्यायालयों तक पहुंच ही नहीं पा रहे, वहां न्याय प्रक्रिया का समदर्शी होना, संदेह के घेरे में स्वतः आ जाता है. न्यायालयों के अंदर की दुनिया के बारे में आम जन को जानने-समझने पर जो दीवार खड़ी की गई है, वह न्यायिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के बजाय, मनमाने व्यवहार की ओर ले जाती है.

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जाति, धर्म और व्यवस्था की कोख से पैदा हो रही मॉब लिंचिंग जैसी बर्बर संस्कृति

गरीब और कमजोर पर जुल्म करने की प्रवृत्ति का फैलाव इसलिए बढ़ा है कि न्यायिक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है. जब तक अत्याचारी आगे बढते जायेंगे और सीधा-सादा समाज पीछे ढकेला जायेगा, यह प्रवृति रुकेगी नहीं. जब हम लिंचिंग करने वालों को मिठाई खिलायेंगे तब समाज में हिंसा स्वीकार्य होती जायेगी.

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