बेहतर दुनिया का ख्वाब देखने और उसके लिए संघर्ष करने वाली राजनीति की लाल पताका उठा रहा है युवा

वामपंथी छात्र संगठन हाथ से बनाए गए कलात्मक पोस्टरों के सहारे चुनाव लड़ रहे थे. भाषण,जनगीत,नुक्कड़ नाटक ही उनकी ताकत थे और पूंजी के नाम पर उनके पास वर्ष भर के छात्र आंदोलनों की सक्रियता की पूंजी थी. उनको न केवल धनबल का मुक़ाबला करना था,बल्कि अपने खिलाफ चलाये जा रहे मिथ्या प्रचार का मुकबला भी करना था. ऐसे में यदि वामपंथी छात्र संगठनों ने इतने बड़े पैमाने पर छात्र-छात्राओं का वोट हासिल किया तो यह निश्चित ही उल्लेखनीय और उम्मीद जगाने वाला है. यह इस बात का भी द्योतक है कि आज के दौर का युवा सिर्फ आई.टी. सेल के घृणा अभियान का वाहक और मॉब लिंचिंग गिरोहों का हिस्सा नहीं बन रहा है,वह आदर्शों, उसूलों वाली बेहतर दुनिया, बेहतर समाज का ख्वाब देखने और उसके लिए संघर्ष करने वाली राजनीति की लाल पताका भी उठा रहा है.

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‘ स्वायत्तता’ का आगमन अर्थात अकादमिक संस्थानों को दुकान में तब्दील करने की तैयारी

(दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर  उमा राग का यह लेख  ‘  द वायर ’ में  29 मार्च को प्रकाशित हुआ  है )   हम से छीन लिया गया कॉपी कलम किताब कैद कर लिया गया हमारे सपने को फिर हम से कहा गया तुम स्वायत्त हो हमारे अधिकारों को छीनने के लिए उन्होंने एक नया शब्द गढ़ा है ‘स्वायत्तता’ जैसे उन्होंने कभी अंगूठा काटने को कहा था ‘ गुरु दक्षिणा ‘ –प्रदीप कुमार सिंह कितनी सच है यह पंक्ति कि हमारे अधिकारों को छीनने के लिए ही अक्सर सत्ता नए-नए…

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