शरतचंद्र का कथा-साहित्य

एक कथाशिल्पी के रूप में शरतचंद्र जहां तक और जिस हद तक भावप्रवण हैं, वहां तक उनका साहित्य आज भी श्रेष्ठ बना हुआ है| लेकिन आज उनके यहां जो कुछ भी श्रेष्ठ है, वह ज़्यादा लोकप्रिय नहीं है और जो आज उनके यहां लोकप्रिय है, वह श्रेष्ठ नहीं है| ‘देवदास’, ‘परिणीता’, ‘रामेर सुमति’, ‘स्वामी’, ‘बड-दिदी’, ‘बिन्दुर छेले’ जैसी अत्यंत लोकप्रिय रचनाओं में हमें राग-द्वेष, भलाई-बुराई, इंसानियत-हैवानियत इत्यादि के मनोवेगों का अद्भुत चित्रण भले मिलता हो, परन्तु इन रचनाओं की संगति आज के जीवन-यथार्थ से नहीं बैठती| जिन रचनाओं का जीवन-यथार्थ, जिनकी रागात्मकता आज के जीवन-यथार्थ से संगत बैठती है, दुर्भाग्य से वह आज उतनी लोकप्रिय नहीं हैं, भले ही इन रचनाओं के शीर्षक पाठक के मनोमस्तिष्क के भीतर अपार लोकप्रियता अर्जित कर चुके हों| ऐसी रचनाओं में ‘चरित्रहीन’, ‘अरक्षणीया’, ‘श्रीकांत’, ‘गृह-दाह’ और ‘पथ के दावेदार’ प्रमुख हैं।

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