ये तारा , वो तारा , हर तारा : लाइट्स बन्द , कैमरा ऑन , एक्शन

डॉ. स्कन्द शुक्ला जब दुनिया में विश्वयुद्ध चल रहा हो और हर जगह बत्ती गुल करने का आदेश हो , तब कोई दूर-सुदूर की ज्योतियों में जीवन टटोल सकता है ? जब आसमान में घुप्प अँधेरा कर दिया गया हो , तब कोई दूरबीनों में नज़रें गड़ाकर तारों की हथेलियाँ देखकर उनकी उम्रें बता सकता है ? और इस तरह तारों को पढ़कर भला क्या ऐसा हासिल हो जाएगा कि उसपर इतनी मग्ज़मारी की जाए ! वॉल्तर बादे और उन जैसे वैज्ञानिक ख़ब्ती नहीं हैं , संसार की चुनिन्दा समझदार…

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वैज्ञानिक-चित्त की खोज में पूरे जीवन बेचैन रहने वाला एक शिक्षाविद्

यशपाल बराबर इस बात को रेखांकित करते थे कि देश में सभी अपने बच्चों को विज्ञान पढ़ाना चाहते तो हैं किंतु वैज्ञानिक दृष्टि नहीं देना चाहते. बच्चों के आगे समाज की पूरी संरचना विज्ञान के प्रतिकूल है. बगैर दृष्टि और समझ के विज्ञान शिक्षा का मूल्य उनके लिए नहीं था. विज्ञान शिक्षा का मतलब उनके लिये सभी तरह की संकीर्णताओं, कूपमंडूकताओं और क्षुद्रताओं को विज्ञान की कसौटी पर जांचना-परखना है.

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