मातृभाषा की नागरिकता

  सदानन्द शाही   जाने कब से लोकमन कहता चला आ रहा है-कोस कोस पर पानी बदले नौ कोस पर बानी. जैसे धरती के भीतर छुपा पानी एक कोस पर बदल जाता है ,वैसे ही नौ कोस की दूरी तय करने पर भाषा बदल जाती है. भाषा का यह बदलाव स्वाभाविक और प्राकृतिक है. इसीलिए भाषाई बहुलता और विविधता भारत का वैभव है लेकिन इसके उलट तीन सौ साल की औपनिवेशिक गुलामी हमें यह समझाने में सफल रही है कि विभिन्न भाषाओं का होना अभिशाप है. हमारे औपनिवेशिक प्रभु हमको…

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