मैंने स्थापित किया अपना अलौकिक स्मारक (अलेक्सान्द्र सेर्गेयेविच पुश्किन की कविताएँ)

 मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह; टिप्पणी : पंकज बोस पुश्किन के बारे में सोचते ही एक ऐसा तिकोना चेहरा जेहन में कौंधता है जिसके माथे पर घने और बिखरे-झूलते हुए बाल हैं और गालों पर दोनों ओर फैली हुई घनी दाढ़ी। कुछ तैल-चित्रों में गहरे काले बालों के साथ लगभग लाल पूरा चेहरा मिलकर एक कंट्रास्ट पैदा करता है और दाढ़ी और सर के बालों के बीच से झाँकता हुआ कान अलग से ध्यान खींचता है। पुश्किन के चेहरे का हर हिस्सा और हर कोना एक भव्यता की…

Read More

क्यों डरती रही हैं भारत की सरकारें 1857 से

1857 ने जिस राष्ट्रवाद का आगाज किया था, उसकी विरोधी शक्तियां आजाद भारत में सत्ता के शिखर पर पहुंच चुकी हैं. यानी पहली जंग-ए-आजादी ने नया हिंदुस्तान बनाने की जो चुनौतियां हमारे सामने उपस्थित की थीं, जो लक्ष्य निर्धारित किये थे, जो सपने देखे थे, वे आज न सिर्फ अधूरे हैं, बल्कि सबसे बड़ी बाधा का सामना कर रहे हैं.

Read More