विकास, विस्थापन और साहित्य (संदर्भ झारखंड)

आज इस बात में किसी को कोई संदेह नहीं रह गया है कि ग्लोबल पूंजीवाद के लाभ-लोभ के चलते दुनिया में गरीबी और पर्यावरण का संकट बढ़ता जा रहा है। अपनी लालच के सिवा उसके सामने आदमी और प्रकृति की चिंता का कोई मायने नहीं रह गया है। विकास की पूंजीवादी अवधारणा या रास्ता विनाश का रास्ता बन गया है। वह जीवन और प्रकृति के विनाश का स्रोत बन गया है। आज दुनिया भर में कुलीन आर्थिक संस्थाओं- आइएमएफ़, वर्ल्ड बैंक, एनएफटीए, डब्यूटीओ आदि के खिलाफ़ विेद्रोह हो रहे हैं। विकास के वैकल्पिक रास्ते पर, न्यायोचित और टिकाऊ मानवीय विकास (Equitable and sustainable human development) के रास्ते का सवाल बहस के केंद्र में आ गया है। यहां इस पर बहस में जाने का अवसर नहीं है लेकिन विकास के इस विनाश की पूरी तस्वीर देखनी हो तो हमें आदिवासी क्षेत्रों की ओर रुख करना चाहिये, जहां सबकुछ साफ-साफ अपनी पूरी नग्नता के साथ मौजूद है।

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सरकारी खजाने से चुनावी यात्रा का औचित्य

  जावेद अनीस मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपने लम्बे कार्यकाल के दौरान बेहिसाब घोषणाओं, विकास के लम्बे-चौड़े  दावों और विज्ञापनबाजी में बहुत आगे साबित हुये है, वे हमेशा घोषणा मोड में रहते हैं और उनकी सरकार के चमचमाते विज्ञापन प्रदेश के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी खुले जेब के साथ प्रसारित होते हैं जिसमें मुख्य रूप से शिवराज और उनकी सरकार की ब्रांडिंग की जाती है. अब विधान सभा चुनाव से ठीक पहले सीएम शिवराज सिंह द्वारा ‘जन आशीर्वाद यात्रा’ निकली जा रही है यह पूरी तरह से एक…

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स्मृति का गांव बनाम रियल पिक्चर

ओंकार सिंह गांव की बात जेहन में आते ही एक पुर सुकून सा मंजर दिमाग में तैरने लगता है. खेत-खलिहान और इनके बीच दूर तक दौड़ती पगडंडियां. पोखर और बाग की अलमस्ती या फिर आंगन से सीवान तक सुबह-शाम की चकल्लस . ये सब मिलकर भागदौड़ की जिंदगी में मानो एक ख्वाबों की झुरझुरी भर देते हैं. ओह, गांव तो यही है पर हकीकत में यही नहीं. सच में, घर के सहन से लेकर सीवान तक ठीक उसी तरह सिमट चुके हैं जैसे टोला पड़ोसी के व्यवहार. आगंतुक की पहले…

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