वह पीड़ा का राजकुंवर था

नीरज प्यार की अहमियत और अपरिहार्यता पर बराबर इसरार करते रहे और वास्तविक जीवन में उसे असंभव जानकर उसकी करुणा से भी आप्लावित रहे. यथार्थ का एहसास न होता, तो यह शोक कहाँ से उपजता ? अहम बात यह है कि इसका उन्हें मलाल नहीं, गर्व है; क्योंकि यह पीड़ा उनके नज़दीक सच्ची मनुष्यता या जन-पक्षधरता और उससे भी अधिक जन से एकात्म होने की निशानी है.

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