‘ जनता बेरोजगारी से त्रस्त, योगी सरकार नाम बदलने में मस्त ’

लखनऊ. फैज़ाबाद और इलाहाबाद का नाम बदले जाने के खिलाफ लखनऊ स्थित पिछड़ा समाज महासभा कार्यालय में बैठक हुई. बैठक में एक स्वर में इसे मूलभूत समस्यओं से भटकाने की ओछी राजनीति कहा गया. इसके खिलाफ जन अभियान चलाए जाने का प्रस्ताव आया. वक्ताओं ने कहा कि नाम बदलने और मूर्तियों की राजनीति जनता के धन का दुरूपयोग कर रही है. जिलों के नाम बदलने में आने वाले खर्च से उद्योग, बेरोजगारी, शिक्षा एवं चिकित्सा जैसी मूलभूत जरूरतों को पूरा किया जा सकता था. पर सरकार का मानसिक दिवालियापन है…

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महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के खिलाफ महिला संगठनों ने धरना दिया

लखनऊ. “ डरें……. कि आप उ.प्र. में हैं ” के बैनर के साथ 23 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश की चरमराती कानून व्यवस्था एवं उसके चलते महिलाओं, बच्चियों, दलितों, अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के खिलाफ एडवा, भारतीय महिला फेडरेशन, एपवा व हमसफर संस्था के संयुक्त तत्वावधान में गाँधी मूर्ति जी.पी.ओ. पर महिलाओं ने धरना दिया. धरने के समर्थन में शहर के कई सामाजिक संगठन, जनसंगठन एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की. यह धरना उ.प्र. में पिछले कुछ समय से प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में हो रही हिंसा की वीभत्स घटनाओं…

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गांव में डॉ. अम्बेडकर व गौतम बुद्ध की मूर्ति रखने पर दलितों का उत्पीड़न

डॉ संदीप पांडेय उ.प्र. के राजधानी लखनऊ से सटे जिलों के दो गांवों में दलित समुदाय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर व भगवान गौतम बुद्ध की मूर्तियां लगा पाने में असफल है क्योंकि गांव के बाहर के शासक दल के प्रभावशाली लोग व प्रशासन के अधिकारी विरोध कर रहे हैं। सीतापुर जिले की बिस्वां तहसील के थानगांव थाना क्षेत्र के गांव गुमई मजरा ग्राम सभा रामीपुर गोड़वा व बाराबंकी जिले के देवा थाना क्षेत्र के सरसौंदी गांव में मूर्तियां लगाने हेतु जिला प्रशासन के माध्यम से शासन से अनुमति भी मांगी गई…

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कार्पोरेट के लिए गांवों तक लाल कारपेट बिछाने की नीति से हो रही है खेती-किसानी की तबाही

खेती-किसानी की नीतियों का वर्तमान स्वरूप किसान हितों के प्रतिकूल है। यह नीति खेती-किसानी की कब्र निर्माण के दूषित नीति के साथ पूरा होने को अभिशप्त जान पड़ता है। इसकी बुनियाद रातों-रात नहीं रखी गई है और न यह राष्ट्रीय नीतियों तक सीमित है। इसके पीछे कार्पोरेट से लेकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नीति और सत्ता का वर्ग चरित्र कार्य कर रहा है ।

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‘पूछूंगी अम्मी से/या फिर अल्ला से/कैसे होता है बचके रहना….!’

आसिफा पर केन्द्रित दो कविता संग्रह का लोकार्पण लखनऊ. निर्भया हो या आसिफा, कठुआ हो या उन्नाव, मुजफ्फरपुर हो या देवरिया – ये स्त्रियों पर होने वाली हिंसा, यौन उत्पीड़न और बर्बरता के प्रतीक हैं। इन घटनाओं ने समाज को उद्विग्न किया है, उद्वेलित किया है। प्रतिरोध के स्वर फूटे हैं। रचनाकारों ने इसे अपने सृजन का विषय बनाया है। कवियों ने कविताएं लिखी हैं। ऐसी ही कविताओं का संग्रह है ‘आसिफाओं के नाम’ और ‘मुझे कविता पर भरोसा है’ जिसका लोकार्पण यहां लखनऊ के राष्ट्रीय पुस्तक मेले के मंच…

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साम्प्रदायिक मनोवृत्ति से मुक्ति की तलाश

समाज में बढ़ते साम्प्रदायिक मनोवृत्ति को कैसे रोका जाये? कैसे नई पीढ़ी में भरी जा रही हिन्दू-मुस्लिम विभाजन, नफरत और भेद-भाव को कम किया जाये, इसी बिन्दु के इर्द-गिर्द शीरोज बतकही की 11वीं कड़ी में रविवार को चर्चा हुई।

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सत्ता पाने का औजार है साम्प्रदायिकता

लखनऊ में शीरोज बतकही की दसवीं कड़ी लखनऊ. हर रविवार आयोजित होने वाले शीरोज बतकही की दसवीं कड़ी में साम्प्रदायिक राजनीति के वर्तमान निहितार्थ पर बातचीत हुई. बातचीत की शुरुआत सामाजिक कार्यकर्ता दीपक कबीर ने की । उन्होंने कहा कि आइडेंटिटी पाॅलिटिक्स के नये उभार का रास्ता, साम्प्रदायिक उभार के रास्ते से संभव हो रही है। उन्होंने कहा कि पहले भी आइडेंटिटी पाॅलिटिक्स होती थी मगर तब वह सत्ता पाने का उपकरण नहीं होती थी। अब स्थिति बदल चुकी है। ब्रिटिश भारत में 1918-20 के आसपास, देश में साम्प्रदायिक संस्थाओं…

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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन

नई दिल्ली. लेखकों, बुद्धिजीवियों व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घर छापेमारी और कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस की गिरफ्तारी के खिलाफ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. बुधवार को छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड आदि राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए. इन विरोध प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में नागरिक, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल हुए. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के विरोध में इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ भवन पर वामपंथी संगठनों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला फूंका…

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‘ आज की कविताएं आत्मचेतस व्यक्ति की प्रतिक्रिया है ’

अनिमेष फाउंडेशन लखनऊ की ओर से फ्लाइंग ऑफिसर अनिमेष श्रीवास्तव की स्मृति में ‘आज की कविता के स्वर’ एवम कविता पाठ का आयोजन किया गया. अनुराग पुस्तकालय लखनऊ में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हरी चरण प्रकाश ने की. उन्होंने अपने वक्तव्य में कविता के समय संदर्भों को व्याख्यायित किया और कहा की कविता गतिमान रहती है जो समय के साथ बदलती रहती है.युवा कवि एवं आलोचक अनिल त्रिपाठी ने ‘आज की कविता के स्वर’ पर अपने विचार रखते हुए मुक्तिबोध का हवाला देते हुए कहा कि आज की कविता आत्मचेतस व्यक्ति की प्रतिक्रिया है.

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लखनऊ में शीरोज बतकही की 9वीं कड़ी : न्याय का अधिनायकवाद बनाम जनविरोधी न्याय तंत्र

आज तीन करोड़ के लगभग मुकदमे विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं. हमारे जातिवादी समाज में दलितों और पिछड़ों की न्यायालयों में न के बराबर भागीदारी है. न केवल जजों की संख्या बल्कि योग्य वकीलों की संख्या में भी इन वर्गों का बहुत कम स्थान है. ऐसे में ऊंच-नीच और गैरबराबरी के इस समाज में, जहां निम्न समाज के लोग न्यायालयों तक पहुंच ही नहीं पा रहे, वहां न्याय प्रक्रिया का समदर्शी होना, संदेह के घेरे में स्वतः आ जाता है. न्यायालयों के अंदर की दुनिया के बारे में आम जन को जानने-समझने पर जो दीवार खड़ी की गई है, वह न्यायिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के बजाय, मनमाने व्यवहार की ओर ले जाती है.

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बिहार बंद के समर्थन में लखनऊ में धरना

मुजफ्फरपुर बालिका गृह बलात्कार कांड के दोषियों को सजा दिलाने के लिए बिहार बंद के समर्थन में आज 2 अगस्त को परिवर्तन चौक पर ऐपवा द्वारा धरना तथा विरोध सभा का आयोजन किया गया. इसमें आइसा, इंकलाबी नौजवान सभा के कार्यकर्ता तथा अनेक लोकतान्त्रिक बुद्धिजीवी शामिल हुए .

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‘वे दर्ज होंगे इतिहास में/पर मिलेंगे हमेशा वर्तमान में/लड़ते हुए/और यह कहते हुए कि/स्वप्न अभी अधूरा है

भारतीय जनता के महानायक और भाकपा माले के संस्थापक महासचिव कामरेड चारू मजूमदार की 46 वें शहादत दिवस को लखनऊ के लेनिन पुस्तक केन्द्र में संकल्प दिवस के रूप में मनाया गया.

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फासीवाद के खिलाफ संघर्ष में मार्क्स के विचार से बेहतर विचार नहीं- दीपंकर भट्टाचार्य

क्रोनी पूंजीवाद, सांप्रदायिक विभाजन और मनुवादी के बीच गठजोड़ है. लिचिंग स्थाई परिघटना बना दी गई है. लिचिंग करने वालों को पता है कि उन्हें सत्ता का संरक्षण मिला है. यह फासीवाद राज्य नही तो क्या है. ऐसे राज्य या तानाशाही के खिलाफ संघर्ष में मार्क्स के विचार से बेहतर विचार नहीं.

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जाति, धर्म और व्यवस्था की कोख से पैदा हो रही मॉब लिंचिंग जैसी बर्बर संस्कृति

गरीब और कमजोर पर जुल्म करने की प्रवृत्ति का फैलाव इसलिए बढ़ा है कि न्यायिक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है. जब तक अत्याचारी आगे बढते जायेंगे और सीधा-सादा समाज पीछे ढकेला जायेगा, यह प्रवृति रुकेगी नहीं. जब हम लिंचिंग करने वालों को मिठाई खिलायेंगे तब समाज में हिंसा स्वीकार्य होती जायेगी.

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विश्वविद्यालयों में बढती प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ लखनऊ में धरना

शैक्षिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों में बढती प्रशासनिक तानाशाही व शिक्षा विरोधी नीतियों के खिलाफ अभिभावक मंच ने 13 जुलाई को परिवर्तन चौक के पास आचार्य नरेन्द्र देव की समाधि स्थल पर धरना व प्रतिरोध सभा का आयोजन किया.

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फर्जी मुठभेड़ों का सवाल उठाने पर आज़मगढ़ पुलिस ने रिहाई मंच के महासचिव को धमकी दी

लखनऊ, 7 जुलाई. फर्जी मुठभेड़ पर सवाल उठाने पर रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव को आजमगढ़ कन्धरापुर थाना प्रभारी ने फ़ोन कर गलियां देते हुए धमकी दी. रिहाई मंच के प्रतिनिधि मंडल ने उत्तर प्रदेश पुलिस महानिरीक्षक, लोक शिकायत मोहित अग्रवाल से 6 जुलाई को मुलाकात कर पत्रक के साथ कॉल डिटेल का व्यौरा सौंपा. प्रतिनिधि मंडल को मोहित अग्रवाल ने निष्पक्ष जाँच का आश्वासन दिया. मंच ने कहा कि किसी भी कीमत पर इंसाफ के सवाल से समझौता नहीं किया जायेगा. रिहाई मंच लखनऊ  के प्रवक्ता अनिल यादव ने…

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प्रो तुलसीराम का चिन्तन अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद के बीच पुल – वीरेन्द्र यादव

प्रो तुलसी राम ने जहां मार्क्सवाद के रास्ते दलित आंदोलन का क्रिटिक रचा, वहीं उन्होंने वामपंथ के अन्दर मौजूद जातिवादी प्रवृतियों का भी विरोध किया. आज जिस तरह हिन्दुत्ववादी शक्तियां आक्रामक हैं, तुलसी राम के विचार मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद के बीच पुल का काम करते हैं.

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मोदी दोबारा सत्ता में नहीं आने वाले – राकेश सिंघा

कामरेड राकेश सिंघा का कहना था कि हिमांचल में वामपंथ आगे बढ़ सकता है तो देश के दूसरे हिस्से में भी यह संभव है। वित्तीय पूंजी ने जैसे अन्तरविरोध खड़े किए हैं, उसका इस्तेमाल करना हमें सीखना होगा। यह आराम से नहीं होगा। भारत का समाज जटिल समाज है तो समस्याएं भी जटिल हैं। प्रतिरोधी मास खड़ा करना जरूरी है।

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‘ चन्द्रेश्वर की कविताएं सरल पर लिखना उतना ही कठिन ’

चन्द्रेश्वर प्रेम और प्रतिरोध के कवि हैं. ऐसी कविताओं की जरूरत थी. ये अपनी रचना प्रक्रिया और कन्टेन्ट में समकालीन कविताएं हैं. यहां व्यंग्य चित्र हैं, बहुत कुछ कार्टून की तरह. ये कविताएं जितनी सरल हैं, इन्हें लिखना उतना ही कठिन है. यहां सरलता जीवन मूल्य है.

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इप्टा के 75 साल , पूरे साल चलेंगे आयोजन

भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) लखनऊ ने इप्टा के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में स्थापना दिवस जनगीतों एवं नाटक ‘हवालात’ की प्रस्तुति के साथ मनाया।

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