उन श्रोताओं के लिए जिन्होंने अपने रेडियो सेट देर से खोले हों

अनुराग शुक्ला वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिकी करते थे हम जीते जी मसरूफ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा या इश्क़ से काम उलझता रहा आखिर में तंग आकर हमने दोनों को अधूरा छोड़ दिया।। आज फ़ैज़ साहब की जयंती है सो हम रेडियो दिवस की बात को भी उनकी नज़्म से शुरू करते हैं। दुनिया में काम से आशिक़ी करने वाले कभी कम न थे और नौ साढ़े नौ बजते बजते वो…

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