स्मृति का गांव बनाम रियल पिक्चर

ओंकार सिंह गांव की बात जेहन में आते ही एक पुर सुकून सा मंजर दिमाग में तैरने लगता है. खेत-खलिहान और इनके बीच दूर तक दौड़ती पगडंडियां. पोखर और बाग की अलमस्ती या फिर आंगन से सीवान तक सुबह-शाम की चकल्लस . ये सब मिलकर भागदौड़ की जिंदगी में मानो एक ख्वाबों की झुरझुरी भर देते हैं. ओह, गांव तो यही है पर हकीकत में यही नहीं. सच में, घर के सहन से लेकर सीवान तक ठीक उसी तरह सिमट चुके हैं जैसे टोला पड़ोसी के व्यवहार. आगंतुक की पहले…

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