बॉलीवुड के स्टीरियोटाइप को तोड़ती ‘ राज़ी ’

एक ऐसे दौर में जब राष्ट्रवाद की नयी परिभाषायें गढ़ी जा रही हों और देशभक्ति पर एकाधिकार जताया जा रहा हो तो ‘राज़ी’ रुपहले परदे पर बहुत ही सशक्त तरीके से यह बताने में कामयाब होती है कि राष्ट्रवाद इकहरा नहीं हो सकता और देशभक्ति होने के लिये किसी एक मजहब का होना जरूरी नहीं है.

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राज़ी : नागरिकता और मनुष्यता का अन्तर्द्वन्द्

नेशन फर्स्ट भूमण्डलित दुनिया का नया फैशन है। अमरीका से लेकर रूस तक इसी नारे पर चुनाव जीते जा रहे हैं। भारत में भी इन दिनों इसी का बोलबाला है। यह एक नई नैतिकता है जिसे हर तरह की नैतिकता के ऊपर बिठा दिया गया है। इस सुपर नैतिकता के पीछे भी एक डर है- देश के टूट जाने का डर। ये डर ही सभी पूर्वग्रहों, नफरतों और पागलपन की जड़ है।

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