सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश

यह सही है कि पितृसत्तात्मकता सभी संस्थागत धर्मों का अविभाज्य हिस्सा है। मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश का आंदोलन इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर चोट कर रहा है और इसके अच्छे नतीजे भविष्य में सामने आ सकते हैं। यद्यपि कानून बनाने से किसी समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होता परंतु यह अपने वैध अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संघर्षरत समूहों की यात्रा में एक मील का पत्थर होता है।

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नफरत की विचारधारा और बढ़ती असहिष्णुता

हिन्दू राष्ट्रवादी ब्रिगेड अब इस भगवाधारी स्वामी को निशाना बना रही है. उन पर हमला, उसी श्रृंखला का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत डॉ दाभोलकर की हत्या से हुई थी. उसके बाद कामरेड गोविन्द पंसारे मारे गए, फिर डॉ कलबुर्गी और उनके बाद गौरी लंकेश. समाज में जैसे-जैसे असहिष्णुता बढ़ रही है, वैसे-वैसे असहमति के लिए स्थान कम होता जा रहा है. जो भी व्यक्ति शासकों की सोच से इत्तेफाक नहीं रखते, उन्हें चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है. चूंकि हमलावरों को पता है कि शासक दल के नेता न केवल उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होने देगें बल्कि वे उनकी प्रशंसा करेंगे इसलिए ऐसे लोगों की हिम्मत बढ़ रही है.

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