अंतःकरण और मुक्तिबोध के बहाने

(मुक्तिबोध के जन्मदिन पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय का आलेख) 2017 में मुक्तिबोध की जन्मशताब्दी गुज़री है और 2018 मार्क्स के जन्म की द्विशाताब्दी है। मुक्तिबोध की रचना और विश्वदृष्टि का मार्क्स की विश्वदृष्टि से गहरा नाता है। यह जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि मार्क्स को गुज़रे 200 वर्ष हो गए, दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई, वे अब पुराने पड़ गए। अब मार्क्सवाद प्रासंगिक नहीं रहा। भारत में तो सत्तारूढ़ दल उन्हें यह कह कर भी नकार रहे हैं कि मार्क्स विदेशी थे…

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विकास, विस्थापन और साहित्य (संदर्भ झारखंड)

आज इस बात में किसी को कोई संदेह नहीं रह गया है कि ग्लोबल पूंजीवाद के लाभ-लोभ के चलते दुनिया में गरीबी और पर्यावरण का संकट बढ़ता जा रहा है। अपनी लालच के सिवा उसके सामने आदमी और प्रकृति की चिंता का कोई मायने नहीं रह गया है। विकास की पूंजीवादी अवधारणा या रास्ता विनाश का रास्ता बन गया है। वह जीवन और प्रकृति के विनाश का स्रोत बन गया है। आज दुनिया भर में कुलीन आर्थिक संस्थाओं- आइएमएफ़, वर्ल्ड बैंक, एनएफटीए, डब्यूटीओ आदि के खिलाफ़ विेद्रोह हो रहे हैं। विकास के वैकल्पिक रास्ते पर, न्यायोचित और टिकाऊ मानवीय विकास (Equitable and sustainable human development) के रास्ते का सवाल बहस के केंद्र में आ गया है। यहां इस पर बहस में जाने का अवसर नहीं है लेकिन विकास के इस विनाश की पूरी तस्वीर देखनी हो तो हमें आदिवासी क्षेत्रों की ओर रुख करना चाहिये, जहां सबकुछ साफ-साफ अपनी पूरी नग्नता के साथ मौजूद है।

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मोदी-योगी सरकार की वादाखिलाफी का जवाब जनता 2019 के चुनाव में देगी : माले

लखनऊ, 26 जून। केंद्र की चार साल पुरानी नरेंद्र मोदी सरकार देशवासियो से किये वादों को पूरा करने में नाकाम साबित हुई है। यही हाल एक साल से ज्यादा समय बिता चुकी योगी सरकार का भी है। दोनों ही सरकारों ने जनता से छल किया है। भाजपा 2019 का चुनाव आतंकवाद और साम्प्रदायिक, जातीय व राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दों को भड़का कर लड़ना चाहती है लेकिन जनता मोदी-योगी सरकार के अपने अनुभवों से सीखते हुए भाजपा के मनसूबों को कामयाब नहीं होने देगी और उसकी वादाखिलाफी का जवाब 2019…

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खैनी खिलाओ न यार! /उर्फ / मौत से चुहल (सखा, सहचर, सहकर्मी, कामरेड महेश्वर की एक याद)

अपने प्रियतर लोगों- कृष्णप्रताप (के.पी.), गोरख, कामरेड विनोद मिश्र, महेश्वर पर चाहते हुए भी आज तक कुछ नहीं लिख सका। पता नहीं क्यों? इसकी वज़ह शायद उनसे एक जरूरी दूरी नहीं बन पाई आज तक, ताकि उसे देख सकूँ। शायद वे सब लोग स्मृतियों में आज भी वैसे ही साथ रहते-चलते चल रहे हों जैसे तब। शायद यह भी कि ये चारों लोग मिल कर स्मृति का एक वृत्त बन जाते हैं, इस तरह कि अलगा कर इनमें से किसी एक पर नहीं लिखा जा सकता। आज महेश्वर की पुण्य-तिथि…

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वाराणसी में भाकपा माले की पूर्वांचल स्तरीय जवाब दो रैली 20 को

मोदी-योगी सरकार द्वारा “अच्छे दिन ” लाने का वादा धोखा साबित हुआ. गरीब-दलित-किसान-नौजवान-महिलायें सभी लोग ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. न दो करोड़ रोजगार मिला न किसानों की आय दोगुनी हुई, न काला धन ही वापस आया. वाराणसी में भाकपा माले की 20 जून की जवाब दो रैली में ये सवाल मजबूती से उठाये जायेंगे.

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