राजेन्द्र कुमार : जैसा मैंने उन्हें देखा

उनका अलंकरण मुश्किल है. उनके बारे में अतिशयोक्ति संभव नहीं. ध्यान से देखें तो उन्होंने अपने जीवन और अपनी रचना में कुछ भी अतिरिक्त, कुछ भी surplus बचाकर रखा नहीं है. जो कुछ भी अर्जित रहा, वह इतने इतने रूपों में बंटता रहा कि कोई चाह कर भी उसका लेखा-जोखा नहीं तैयार कर सकता. सामाजिक सक्रियताओं, लेखकीय प्रतिबद्धताओं, अध्यापकीय और पारिवारिक जिम्मेदारियों के दरम्यान उनका सारा अर्जन मानों खुशबू की तरह बिखर गया है.

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महावीर प्रसाद द्विवेदी का स्मरण आज भी क्यों ज़रूरी है

द्विवेदी जी उस ईश्वर को ‘भ्रष्ट ईश्वर’ कहते हैं, जिसकी दुहाई छुआ-छूत मानने वाले देते हैं. द्विवेदी जी का निर्भीक आह्वाहन है- ‘ऐसे भ्रष्ट ईश्वर का संसार छोड़ देना चाहिए.’ द्विवेदी जी ने ही सरस्वती में हीरा डोम की कविता छापी. इसी तरह स्त्री-अस्मिता के सवाल को द्विवेदी जी ने उठाया, ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ शीर्षक लेख लिखकर.

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