गांव की साझी सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन गति और उसके संकट को केन्द्र में रखती है हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’

(हाल ही में ‘पल-प्रतिपल’ में प्रकाशित हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’ को हमने समकालीन जनमत पोर्टल पर प्रकाशित किया , जिस पर पिछले दिनों पोर्टल पर काफी चर्चा हुई और बहसें भी आयीं। बहस को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है कहानी पर युवा आलोचक और ‘कथा’ के संपादक दुर्गा सिंह की टिप्पणी: सं) कहानी गांव की साझी सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन गति और उसके संकट को केन्द्र में रखती है।यह संकट विभाजनकारी साम्प्रदायिक राजनीति द्वारा पैदा किया गया है। यह संकट पहले भी मौजूद था, लेकिन वह गांवों के सामूहिक ताने-बाने…

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‘कुछ नॉस्टैल्जिया तो है’ हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’ में

(कथाकार हेमंत कुमार की कहानी ‘ रज्जब अली ’ पत्रिका ‘ पल-प्रतिपल ’ में प्रकाशित हुई है. इस कहानी की विषयवस्तु, शिल्प और भाषा को लेकर काफी चर्चा हो रही है. कहानी पर चर्चा के उद्देश्य से समकालीन जनमत ने 22 जुलाई को इसे प्रकाशित किया था. कहानी पर पहली टिप्पणी युवा आलोचक डॉ. रामायन राम की आई जिसे हमने प्रकाशित किया है, दूसरी टिप्पणी जगन्नाथ दुबे की आई जो डॉ. रामायन राम द्वारा उठाए गए सवालों से भी टकराती है . इस कहानी पर राजन विरूप की टिप्पणी भी…

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समाज का सच सामने लाती है हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’

(कथाकार हेमंत कुमार की कहानी  ‘ रज्जब अली  ’ पत्रिका ‘ पल-प्रतिपल ’ में प्रकाशित हुई है. इस कहानी की विषयवस्तु, शिल्प और भाषा को लेकर काफी चर्चा हो रही है. कहानी पर चर्चा के उद्देश्य से समकालीन जनमत ने 22 जुलाई को इसे प्रकाशित किया था. कहानी पर पहली टिप्पणी युवा आलोचक डॉ. रामायन राम की आई  जिसे हमने प्रकाशित किया है,  दूसरी टिप्पणी जगन्नाथ दुबे की आई जो डॉ. रामायन राम द्वारा उठाए गए सवालों से भी टकराती है . इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है…

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हेमन्त कुमार की कहानी ‘ रज्जब अली ’ में सामंती वैभव देखना प्रतिक्रियावाद को मजबूत करना है

कहानी में मूल समस्या साम्प्रदायिकता है. यह कहानी हमारे समय के लिहाज से एक बेहद जरूरी कहानी है. इसलिए जरूरी यह है कि इस कहानी के मूल मन्तव्य पर बात हो. कहानी के मूल मन्तव्य पर बात न करके हम उन्ही प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ मजबूत करते दिखेंगे.

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सामंती वैभव के प्रति नॉस्टेल्जिया से ग्रस्त है कहानी ‘ रज्जब अली ’

‘ रज्जब अली ’ कहानी में कथाकार बड़ा आख्यान रचने की कोशिश में कई ऐसी गलतियाँ कर बैठे हैं जिसकी वजह से अपने बड़े उद्देश्य के बावजूद इसकी विश्वसनीयता सन्देह के घेरे में आ जाती है. सबसे पहली बात यह कि आज के भारत का फासीवाद निश्चित तौर पर मुसलमानों और दलितों के दमन के जरिये आगे बढ़ रहा है लेकिन आज के दमन का रूप वह नहीं है जो प्रेमचंद के जमाने मे था या आज से चार-पांच दशक पहले तक था. आज दलित पीड़ित हैं लेकिन मजलूम नहीं हैं.

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