वीरेन दा की याद: ‘नदी’ कविता के बहाने से

शिव प्रकाश त्रिपाठी “ लंबे और सुरीले नहीं थे मेरे गान मेरी सांसे छोटी थी पर जब भी गाए मैंने बसंत के ही गान गाए अपनी फटी हुई छाती के बावजूद” बसंत आ चुका है पर न तो हवा में रवानगी ही आई और न फूलों में भौरें. फूल खिले तो हैं पर उनमें कालिख की एक पूरी परत चढ़ी हुई है. ये अंधकार युग की पदचाप भी हो सकती है. एक ऐसा समय गति में है, जहाँ एक तरफ पूरे विश्व में वैश्वीकरण बनाम संरक्षणवाद पर छाती-पीट बहस चल…

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जलियांवाला बाग नरसंहार को याद रखना ज़रूरी है ताकि सनद रहे! : प्रो. चमनलाल

आज से 99 साल पहले इसी दिन पंजाब के अमृतसर शहर में एक ऐसी घटना हुई जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक लोकगाथा बन गई थी ।यह घटना थी, 13 अप्रैल 1919 को वैशाखी के हँसी-खुशी के त्योहार के अवसर पर ब्रिटिश शासकों द्वारा एक ऐसा हत्याकांड , जिसकी बर्बरता ने पूरे विश्व में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के असली चेहरे को दिखा दिया । जलियावाला बाग हत्याकांड इसके बाद एक उदाहरण बन गया और आज भी देश में जब किसी भी जगह से पुलिस के भयानक अत्याचारों के समाचार आते…

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