‘ रेख्ता के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था ’

लखनऊ में ‘ ब याद: मीर तकी मीर ’ का आयोजन  कौशल किशोर ‘रेख्ता के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब/कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था’.  गालिब के मुख से यह शायरी बेसाख्ता तब निकली जब उन्होंने किसी फकीर से मीर की एक नज्म सुनी. गालिब भी उनकी उस्तादी को मानते थे.  मीर तकी मीर आला दर्जे के शायर थे.  उनकी अपनी बात की अदायगी में बड़ी सादगी थी. गालिब की चर्चा तो आम रही. वे बहुत पढ़े गये पर मीर को कम जाना गया. गौर किया…

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