अंतःकरण और मुक्तिबोध के बहाने

(मुक्तिबोध के जन्मदिन पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय का आलेख) 2017 में मुक्तिबोध की जन्मशताब्दी गुज़री है और 2018 मार्क्स के जन्म की द्विशाताब्दी है। मुक्तिबोध की रचना और विश्वदृष्टि का मार्क्स की विश्वदृष्टि से गहरा नाता है। यह जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि मार्क्स को गुज़रे 200 वर्ष हो गए, दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई, वे अब पुराने पड़ गए। अब मार्क्सवाद प्रासंगिक नहीं रहा। भारत में तो सत्तारूढ़ दल उन्हें यह कह कर भी नकार रहे हैं कि मार्क्स विदेशी थे…

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क्यों डरती रही हैं भारत की सरकारें 1857 से

1857 ने जिस राष्ट्रवाद का आगाज किया था, उसकी विरोधी शक्तियां आजाद भारत में सत्ता के शिखर पर पहुंच चुकी हैं. यानी पहली जंग-ए-आजादी ने नया हिंदुस्तान बनाने की जो चुनौतियां हमारे सामने उपस्थित की थीं, जो लक्ष्य निर्धारित किये थे, जो सपने देखे थे, वे आज न सिर्फ अधूरे हैं, बल्कि सबसे बड़ी बाधा का सामना कर रहे हैं.

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कार्ल मार्क्स : एक जीवन परिचय

दुनिया के मजदूरों के, सिद्धांत और कर्म दोनों मामलों में, सबसे बड़े नेता कार्ल मार्क्स (1818-1883) का जन्म 5 मई को त्रिएर नगर में हुआ जो प्रशिया के राइन प्रदेश में था । पिता पेशे से वकील थे, यहूदी थे लेकिन बाद में प्रोटेस्टेंट धर्म स्वीकार कर लिया था । त्रिएर नगर में प्रारंभिक शिक्षा जिम्नेजियम यानी विशिष्ट पाठशाला में हुई । जिम्नेजियम में ही उन्होंने पेशे के चुनाव पर विचार करते हुए एक लेख लिखा था जिससे आगामी जीवन की उनकी गतिविधियों का अनुमान होता है । इसमें उन्होंने…

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मार्क्स ने खुद के दर्शन को निर्मम और सतत आलोचना के रूप में विकसित किया : दीपंकर भट्टाचार्य

मार्क्स के दबे हुए लोग और अंबेडकर के बहिष्कृत लोग एक ही हैं। इसी तरह मार्क्स ने भारत में जिसे जड़ समाज कहा, अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद-मनुवाद कहा, एक ही है। उन्होंने कहा कि बुद्ध, अंबेडकर और मार्क्स अगर पूरक लगते हैं तो ऐसा मानने वालों को ही यह काम करना है, नई लड़ाई को चलाना है।

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