मजदूरों को निचोड़ने और फेंकने का काल है यह

आज संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों में मजदूरों की दशा, अमानवीयता का सामना कर रही है। अपने देश में ज्यादातर मजदूर असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं और लचर श्रम कानून की सीमा से परे होते हैं । केवल 8-9 प्रतिशत मजदूर ही श्रम कानून के अंतर्गत आते हैं । फिर भी नीति नियंताओं की आंखों का पानी मर चुका है। विशेष दुर्दशा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की है जिनकी संख्या कुल मजदूरों का लगभग 92 प्रतिशत हैं । संगठित क्षेत्रों में महज 5 प्रतिशत मजदूर हैं। जिस शिकागो सम्मेलन के द्वारा काम के आठ घंटे निर्धारित करने की लम्बी लड़ाई मजदूरों ने लड़ी थी और जिसे आज भी मजदूर दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है, वह बेमानी हो चुका है । आज श्रमिकों से अठारह-अठारह घंटे काम लिया जा रहा है। बदले में किसी प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए समय नहीं दिया जा रहा ।

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हम सबके गंगा जी

वामपंथी आन्दोलनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नब्बे के दशक में एक व्यक्ति को बहुत शिद्दत से मार्क्सवादी साहित्य की किताबों का स्टाल लगाए देखा करता था. बाद में जब प्रतिरोध का सिनेमा और गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल की सक्रियता बढ़ी तब इस शख्स से सीधी मुलाक़ात संभव हुई. ये थे हम सबके गंगा जी. हमारे पहले गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल में भी गंगा जी का स्टाल लगा और फिर वे अपने एक अन्य सहयोगी और मित्र गौड़ साहब के साथ आगे चार फेस्टिवलों में शरीक होते रहे. मैं आदतन उनसे हर रोज…

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