‘ भीड़-तंत्र’ को कैसे समझें !

कॉर्पोरेट मीडिया की अगुआई में इन दिनों सत्ता के सभी संस्थान एक हाथ से साम्प्रदायिक नफ़रत बाँट रहे हैं, दूसरे हाथ से भारत की सम्पदा-सम्प्रभुता का सौदा कर रहे हैं – देशभक्ति के नाम पर यह काम खुलेआम हो रहा है। सवाल यह है कि नफ़रत के ‘विकास’ की दक्षिणपंथी राजनीति क्या केवल अफ़वाह के दम पर संचालित है ? आमतौर पर यही माना जा रहा है जो कि पूरी तरह सही नहीं है ! हमें इस सवाल का जवाब चाहिए कि नफ़रत के ‘ ग्राहक ’ का उत्पादन कैसे हो रहा है, कहाँ हो रहा है ? दूसरी बात यह कि किसी टीकधारी को देशभक्ति की पुड़िया खिलाना इतना सरल क्यों हो रहा है ? यह ‘देशभक्त’ हिंसा हत्या की बन्द गली में ऐसे कैसे फँस जा रहा है कि असत्य-अन्याय की जयकार ही उसका कर्तव्य हो रहा है ? वैचारिक रूप से अन्धे और मानसिक रूप से बहरे इस ‘फासिस्ट’ की निर्मिति में उस राजनीति की भी कोई भूमिका बन रही है क्या – जो सामाजिक न्याय और अम्बेडकरवाद के नाम पर की जा रही है ? भक्ति भाव में पगी, देशभक्ति की सगी सामाजिक चेतना निजीकरण के किन स्रोतों से पोषित है, भेदभाव के किन मूल्यों से प्रेरित है जो इन दिनों ‘भीड़-तंत्र’ का हिस्सा बनने को अभिशप्त है.

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