भारतीय चित्रकला और ‘कथा’ : 4

चित्रकला के सन्दर्भ में ‘कथा’ का महत्व केवल भारत तक ही सीमित है, ऐसा कहना गलत होगा। पर जिन देशों के लोगों के चिंतन में वैज्ञानिक, तार्किक और आधुनिक विचारों को विस्तार मिला है वहाँ ऐसे चित्र अपनी उपयोगिता खो चुके हैं और अब उन देशों में , उन्हें केवल संग्रहालयों में ही देखा जा सकता है। पर जहाँ स्थितियाँ नहीं बदल सकी हैं वहाँ आज भी लोग चित्रकला को ‘कथाओं’ के वाहक समझते हुए चित्रों को देखने के बजाय सुनना या पढ़ना चाहते हैं। स्वाभाविक रूप से यह , राज सत्ता और धर्म सत्ता के लिए सबसे अनुकूल स्थिति है।

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भारतीय चित्रकला में ‘कथा’ : 3

वह ‘कथा’ जिसे हम किसी चित्र में चित्रित पाते है , वास्तव में उस कथा से हमारा परिचय चित्र के माध्यम से नहीं बल्कि साहित्य (लिखित या वाचिक) के माध्यम से होता है , चित्र में हम केवल उस व्याख्या के अनुरूप उपस्थितियों को पहचान ही पाते हैं। किसी महापुरुष या देवता की कथा का चित्र में ‘चित्रण’ को हम इसलिए महान मान लेते हैं, क्योंकि हम उस चित्र में उस महापुरुष को उसके रंग , वेशभूषा , अलंकार , मुकुट और उनकी क्रियाओं / ‘लीलाओं’ से पहचान लेते हैं । महज चित्र में किसी परिचित कथा या नायक को किसी स्थापित कथा के अनुरूप पहचान लेना लेना, कभी भी चित्र देखने का तरीका नहीं हो सकता।

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भारतीय चित्रकला और ‘कथा ‘ : 2

हमने देखा की जिस समाज में दृश्य को ‘पढ़ना’ सिखाया जाता हो वहाँ कथाओं का ‘चित्रण’ ही हो सकता है, कला का सृजन नहीं। चित्रकार विन्सेंट वॉन गॉग (1853 -1890) आसमान पर अलग से दमकते सात तारों को महज तारों के रूप में देख कर उनकी सुंदरता से मुग्ध होने वाले कलाकार थे। उनका बनाया हुआ विश्वप्रसिद्ध चित्र ‘रोन नदी के ऊपर तारों भरी रात’ (Starry night over the river Rhone :1888) को देख कर हम सहज ही समझ सकते हैं कि एक चित्रकार के लिए प्रकृति को ‘पढ़ना’ और उसे ‘देखने’ में क्या अंतर होता है।

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भारतीय चित्रकला में ‘ कथा ’

’ ( एक लम्बे समय से भारतीय चित्रकला में जो कुछ हुआ वह ‘कथाओं’ के ‘चित्रण’ या इलस्ट्रेशन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था इसलिए यहाँ ‘सृजन’ से ज्यादा कौशल को महत्व दिया जाता रहा .  इसमें कोई  संदेह नहीं कि एक ओर जहाँ कला में ‘कौशल’ या ‘नैपुण्य’  का महत्व सामंतवादी व्यवस्था में बढ़ता है वहीं दूसरी ओर कला में ‘कथा’ के महत्व को सर्वोपरि बनाये रखना , धर्मसत्ता की एक बुनियादी जरूरत होती है. अब तक के ‘तस्वीरनामा’ में हर सप्ताह हम आप किसी चित्र-विशेष  के बारे में…

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भारतीय चित्रकला में स्त्री को उपेक्षित रखा गया है- अशोक भौमिक

पटना: 13 अगस्त 2018. ‘‘भारतीय चित्रकला में ज्यादातर पुरुषों और पितृसत्तात्मक समाज को महिमामंडित करने का कार्य ही किया गया है। स्त्रियों को दोयम दर्जे का स्थान दिया गया है और उन्हें पुरुषों पर आश्रित दिखाया गया है।’’ ये बातें प्रख्यात चित्रकार अशोक भौमिक ने जन संस्कृति मंच द्वारा स्थानीय छज्जूबाग में आयोजित व्याख्यान ‘भारतीय चित्रकला में स्त्री’ में कही। यह कार्यक्रम बिहार और पूरे देश में स्त्रियों के साथ हो रही यौन-हिंसा की नृशंस घटनाओं के खिलाफ आयोजित था। अशोक भौमिक ने व्याख्यान-प्रदर्शन के दौरान यह बताया कि प्राचीन…

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