कुमार मुकुल की कविताएँ : लोकतंत्र के भगवाकरण की समीक्षा

30 वर्षों से रचनारत कुमार मुकुल के कविता परिदृश्य का रेंज विशाल और वैविध्य से भरा है , प्रस्तुत कविताओं में आज के समय को कुमार मुकुल ने मूलतः लोकतंत्र के भगवाकरण की समीक्षा के बतौर सामने रखा है.

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गुजरात में पाठ्यपुस्तकों का भगवाकरण

   लोकेश मालती प्रकाश    “अपने विषय-वस्तु व रूप से [पाठ्यपुस्तकें] वास्तविकता की विशिष्ट रचनाओं, संभावित ज्ञान के व्यापक ब्रह्मांड में से चुनने और व्यवस्थित करने के विशिष्ट तौर-तरीकों को प्रकट करती हैं। रेमण्ड विलियम्स जिसे चयनशील परंपरा कहते हैं, वे उसी का मूर्त रूप हैं – यानी किसी खास व्यक्ति का चयन, वैध ज्ञान और संस्कृति की किसी खास व्यक्ति की दृष्टि – एक ऐसी परंपरा जो किसी एक समूह की सांस्कृतिक पूंजी को मान्यता देने की प्रक्रिया में दूसरों की सांस्कृतिक पूंजी को अमान्य बना देती है। माइकेल…

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